बुरा दौर समाज को परखने का कुदरती पैमाना है। ऐसा नही है कि कोरोना भारत में मनुष्य जाति के लिए सबसे बड़ा संकट है, लेकिन एक साथ सम्पूर्ण स्थानों पर व्याप्त है इसलिए बहुत गम्भीर लग रहा है। क्या आज से पहले कभी हैजा महामारी नही था क्या ? लेकिन जैसे जैसे लोग साफ सफाई से रहने लगे बीमारी अपने आप साफ होने लगी। यह भी एक ऐसा दौर था जब किसी को हैजा होने लगती थी तो बाकी के लोग खुद को ऐसे व्यक्ति से अलग कर लेते थे। क्या भारत में टीवी (tubercle bacillus ) कम गम्भीर बीमारी है ? वर्ष 2018-19 के आंकड़ों में टीवी से 79,144 लोगों ने दम तोड़ा जबकि 24 लाख से ज्यादा लोग संक्रमित मिले। सोचिए, हर घड़ी न जाने कितने लोग कोरोना के अलावा भी अन्य बीमारियों से भारत में दम तोड़ते हैं। लेकिन क्योंकि ऐसा एक साथ सभी राज्यों में नही हो रहा इसलिए हमें इस भयंकर बीमारी की परवाह नही है। क्या टीवी (tubercle bacillus) संक्रामक बीमारी नही है ? बिल्कुल है लेकिन इसका मौत का खेल धीमा है इसलिए सुरक्षा पर हमारा ध्यान नही है।

सवाल ये है कि क्या हम हैजा या टीवी (tubercle bacillus ) में अपने परिजनों को छोड़ देते थे/है। जवाब है, नही ! क्योंकि हमने दिमाग में इन बीमारियों को इतनी हवा नही दी जितनी की कोरोना वायरस को। लेकिन इसका मतलब ये तो नही कि हैजा या टीवी (tubercle bacillus) अपने दौर की भयंकर बीमारियां नही थी। सवाधानी बहुत जरूरी है लेकिन बीमारी और बीमार से भागना समाधान नही है। हाल ही में पहाड़ समीक्षा ने कुमाऊँ की मोहिनी देवी की कहानी पाठकों के साथ सांझा की थी, कि कैसे पूरे परिवार ने घर पर ही कोरोना को मात दी। उसके पीछे बहुत बड़ी वजह थी एक दूसरे का सहयोग और भावनात्मक लगाव जिसने बौद्धिक स्तर पर टूटने नही दिया।

कोरोना की इस बीमारी को हमने इतना बड़ा बना दिया कि मरीज को एक रिपोर्ट के भरोसे हस्पताल में अकेला छोड़ दिया। अपनों के शवों से इतना डरने लगे कि उसको अंतिम संस्कार तक ले जाने का साहस भी खो दिया। माँ पुत्र को इस भय के छोड़ रही है कि कहीं वह भी संक्रमित न हो जाए और मृत्यु को प्राप्त न कर ले। ऐसी तस्वीर वाकई विचलित कर देने वाली हैं। इसका मतलब तो ये हुआ कि लोगों को भौतिकता से ज्यादा स्नेह है बजाय उस आत्मा के जिसने उनके घर में जन्म पाया। भौतिकता में जीने वाले व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति का सहारा ज्यादा चाहिए होता है बजाय अध्यात्म की तरफ झुके व्यक्ति के। लेकिन आज प्रति एक लाख पर भी ऐसा व्यक्ति ढूंढना बहुत कठिन है। इसलिए एक दूसरे के सहारे के बिना इस भौतिकता से लड़ना असम्भव है।  

पुणे में एक हस्पताल है "नायडू" शायद आपने नाम सुना होगा क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी वहां के स्टाफ से पहली लहर कोरोना में संवाद कर चुके हैं। वहाँ जब एक पत्रकार पहुंचा तो उसने वहां के स्टाफ से कोरोना की द्वितीय लहर के बारे में जानकारी हासिल की और जवाब में जो स्टाफ ने बताया वह परिणाम हैरान करने वाला था। 58 वर्षीय नर्स ने बताया कि हमने मरीज को उसके परिजनों से अलग नही किया जिस वजह से मरीज जल्दी से ठीक हो रहे हैं। नर्स के अनुसार मृत्यु दर शून्य है। हाँ जिनको कोरोना के साथ अन्य गम्भीर बीमारियां है ऐसे कुछ केस खराब हुए हैं लेकिन केवल कोरोना मरीज को हम आईसीयू से भी बाहर लाने में सक्षम रहे हैं।  

कोरोना वायरस अन्य मौजूदा वायरस के मुकाबले ज्यादा सक्षम हो सकता है, लेकिन इतना सक्षम मत बनाइये कि अपनों को छोड़कर भागना पड़े। इंसान ही इंसान से दूर भाग रहा है। आपकी यह भयभीतता बाजार में अपसर खोरों को दोनम्बरी का मौका देती है। इंसान के रूप में भेड़िए इसी वक्त का इंतजार करते हैं क्योंकि भौतिकता की चकाचौंध सबसे ज्यादा भेड़िया को ही प्रभावित करती है। इंसान और अन्य प्राणियों में सिर्फ एक ही भेद है और वह है चेतना। तो जब वक्त आए तो इसका परिचय दीजिए । यह जरूरी नही कि समाज में कूदकर, लेकिन जिनके लिए दायित्व है उनके लिए अंत तक निर्वहन कीजिए।