अब चुनाव आयोग को एक मुक्त संस्था माना जाता रहा था लेकिन बंगाल चुनाव में जिस प्रकार से चुनाव आयोग ने मोदी के इशारों पर काम किया उससे साफ हो गया है कि चुनाव आयोग लंबे समय से मोदी सरकार की हाथों की कठपुतली बना हुआ है। मोदी और चुनाव आयोग मिलकर भी जब ममता बैनर्जी को नही हरा पाए तो चुनाव आयोग बौखला गया। जिसको बौखलाना वो इसलिए नही बौखला पाया क्योंकि कोरोना के चलते पहले ही देश से लेकर विदेश तक थू-थू हो रही है, इसलिए चाय से ज्यादा केतली गर्म है। उच्च न्यायालयों कि आलोचना के बाद जिस तरह की खबरें कुछ चैनलों ने दिखाई (बिके हुए चैनलों को छोड़) उससे भारतीय चुनाव आयोग की भी थू-थू हो रही है। कोर्ट कह रहें है कि चुनाव आयोग के कर्मियों पर हत्या का मुकदमा क्यों न दर्ज हो ? जब रैलियां हो रही थी उस वक्त क्या चुनाव आयोग घास चरने दूसरे ग्रह पर गया हुआ था। इस बात को लेकर बिका हुआ चुनाव आयोग इतना खफा हुआ कि सीधे सुप्रीम कोर्ट में चला गया की मीडिया पर कोर्ट के अंदर की बातें रिकॉर्ड करने पर प्रतिबंध लगे। अब सोचिए ऐसी सोच तो किसी नीच व्यक्ति की हो सकती है जिसको सच जनता से छुपाना हो। खैर, उम्मीद इसलिए भी थी चुनाव आयोग को क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चार जज भाजपा के पाले में झुके रहे और एक को भाजपा ने पार्टी सदस्यता भी दी। लेकिन इस बार ऐसा नही हुआ क्योंकि जज बदल चुके हैं और शायद अभी भाजपा की पहुंच से बाहर हैं इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये मीडिया की स्वतंत्रता पर प्रहार होगा अतैव इस पर रोक नही लगाई जा सकती है।

ये भारतीय इतिहास में पहली बार हुआ कि जब सच दिखाने को लेकर चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। ये वही चुनाव आयोग है जो ईवीएम मशीनों को भाजपा नेताओं/कार्यकर्ताओं के घर पर रखवाता है और पूरी चुनावी प्रक्रिया पर मौन धारण किए होता है लेकिन जब ममता दीदी मोदी को चारों खानों में चित्त कर देती हैं तो कार्यकर्ताओं के जश्न पर कोरोना का हवाला देता है। वाह ! इतना दोगला पन कहाँ से लाते हो भैय्या ? कहीं मोदी जी ने भाजपा कि टिकट तो आफर नही कर दी है। सोचिए, आम जनता कैसे भरोसा करे इन पर। राजनीति में आये थे गैस, पेट्रोल और मंहगाई का मुद्दा लेकर और कर गये महंगाई दो गुनी से भी अधिक। 75 से 80 रुपये प्रति लीटर बिकने वाला सरसों का तेल मोदी राज में 175 रुपये प्रति लीटर हो गया और कह रहें किसान बिल किसानों के हित में है। सड़के बनाकर देश पर कोई उपकार नही किया भाजपा ने बदले में टोल टैक्स के जरिए पूरे पैसे आम जनता से ही वसूला जा रहा है। टोल टैक्स का आलम यह है कि अम्बाला से देहरादून आने तक ही तीन टोल टैक्स देने पड़ते हैं और इसके अलावा पेट्रोल पर 35 से 40 रुपया प्रति लीटर टैक्स चुकाना पड़ता है। तो अब आप सोचिए कि सरकार ने आपको क्या दिया। भारत एक मात्र ऐसा देश है जिसके सभी नागरिक टैक्स चुकाते हैं लेकिन सरकार कहती है कि लोग टैक्स चोरी करते हैं। बिना टैक्स के भारत में सूईं भी नही मिलती है और बदले में भारत सरकार जनता को क्या दे रही है, किसी से छुपा नही है।

कांग्रेस ने भारत में बहुत घोटाले किये लेकिन कांग्रेस सरकार जनता से डरती थी। यही कारण था कि उन्हीं की लाई हुई जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) स्कीम वह लागू नही कर पाए। नौटबंदी और नागरिकता का पूरा खाका तैयार करने वाली कांग्रेस यह सोचकर पीछे हट गई कि इसका जनता में बुरा असर पड़ेगा। लेकिन इन सब नीतियों का विरोध करने वाले सत्ता में आते ही इन्हीं नीतियों के हितेषी बन गये और मझेदार बात यह है कि इतना भी दिमाग नही लगया कि उन नीतियों कुछ और फेरबदल कर सकें। आजम, जनता ने कैसे कैसे कर मुश्किल परिस्थितियों का सामना किया ये जनता ही जानती है। जितना साथ जनता ने मोदी और उनकी सरकार का दिया इतना आज तक इंदिरा गांधी सरकार के बाद किसी में नहीं मिला। लेकिन अच्छे दिन इतने भारी पड़ेंगे कि लोगों की थाली से दाल भी गायब हो जाएगी, लोगों ने नही सोचा था। हाँ, ये भी सच है कि एक तबका जिसको दिन के 200 रुपये मिल जाए तो उसको लगता है बहुत है, आज भी मोदी के समर्थन में हैं। वजह यह है कि उसको दुकान से 3 रुपये का प्याज, 2 का टमाटर और 5 का तेल लेने की आदत है उससे ऊपर न उसने कभी सोचा न उठ पायेगा, क्योंकि अब वह 10 का प्याज, 10 का टमाटर और 30 का तेल लेकर काम से घर लौटता है। उसको शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी चीजों से कोई फर्क नही पड़ता है लेकिन भारत ने पाकिस्तान की लेनी देनी की और चीन को भारतीय जमीन से दो कदम पीछे धकेला, ऐसी खबरों से बहुत फर्क पड़ता है। यही बात मोदी जी भली प्रकार से जानते थे इसलिए हर लोकसभा से पहले मोदी जो ऐसा कोई स्टंट जरूर करते हैं। बाकी हिन्दू - मुसलमान को लड़ाना तो उनकी राजनीति का पहला अध्याय है, जहां से राजनीति में एंट्री हुई तो उसको कैसे छोड़ दें। बैरहाल चुनाव आयोग अब एक मुक्त संस्था नही है इसलिए कहीं परीक्षा में आये तो जवाब सही कर लीजिएगा।