भारत में मार्च 2020 में पहली बार कोरोना को लेकर बेहद समझारी से लॉक डाउन का कदम उठाया गया। इस कदम के चलते संक्रमण की दर लगातार घटती गई और नीतिजा ये हुआ कि हस्पतालों पर पड़ने वाला दबाव बेहद कम था। जो लोग हस्पतालों तक पहुंचे उनको पूरी सुविधा मिली तो रिकवरी भी ज्यादा प्रभावशाली रही। लॉक डाउन से देश की अर्थव्यवस्था को धक्का लगा और वजह थी खरीददारी का कम होना, क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था का एक बहुत बड़ा हिस्सा जनता से वस्तु कर के रूप में लिया जाता है। लेकिन इन सब के बीच प्रधानमंत्री राहत कोष में काफी पैसा लोगों ने चंदे के रूप में दिया, दूसरा वर्ड हेल्थ संगठन ने भी इस महामारी के लिए बड़े पैमाने पर मदद की और इसके अलावा बीमारी से बचने के लिए विश्व बैंक से लिया गया कर्जा इत्यादि। मतलब पहली लहर में भारत को कोरोना से कोई बहुत बड़ा नुकसान नही हुआ था और देश के नागरिक सुरक्षित थे।

चूक कहाँ हुई ? नवम्बर 2020 तक भारत में स्थिति सामान्य होने लगी थी और देश में कोरोना से प्रतिरक्षा के लिए दो-दो दवाईयां भी बनकर तैयार हो चुकी थी। आर्थिक आधार पर भी भारत को बहुत बड़ा नुकसान नही हुआ था क्योंकि तमान तरीकों से देश की केंद्र सरकार को बहुत से फंड मुहैया हो चुके थे। भारत से पहली चूक ये हुई कि प्रधनमंत्री ने भारत में बनने वाली वैक्सीन की 06 करोड़ मात्रा (डोज) 93 देशों को बेच दी, जबकि अमेरिका, कैनेडी, इंग्लैंड और रूस जैसे देशों ने पहले वैक्सीन अपने नागरिकों लगाई न की दूसरे देशों को भेजी। इसका एक बड़ा नुकसान ये हुआ कि भारत 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों का टीकाकरण भी समय पर नही कर पाया तो युवाओं को ऐसे में टीका मिलना एक बड़ी चुनौती बन गया। दूसरी बड़ी गलती केंद्र सरकार ने यह कर दी कि धार्मिक आयोजनों, वैवाहिक कार्यों और चुनावी रैलियों के आयोजनों पर अंकुश नही लगाया। इन सब में 20 से 50 वर्ष आयु का नागरिक बढ़चढ़ का हिस्सा लेता रहा जिससे संक्रमण युवाओं को तेजी से अपनी चपेट में लेता रहा। संक्रमण जनवरी से ही बढ़ने लग गया था लेकिन सरकार चुनावी रैलियों में मस्त रही और जब होस आया तो एक दम से भय का माहौल बना दिया गया। नतीजा, लोगों में नए वायरस वेरिएंट का खौफ इतना बढ़ गया कि सीधा हस्पतालों की तरफ रुख करने लगे और हस्पताल आधारभूत सुविधाओ के लिए संघर्ष करने लगे।

कोरोना की दूसरी लहर से भारत बिना वैक्सीन के भी उभर सकता था लेकिन केंद्र सरकार के पास उचित रणनीति के अभाव के चलते लोगों में डर का माहौल बन गया और लोग खुद से अपने डॉक्टर बन गये। प्रायः देखा जा रहा है कि सुरवाती 4-5 दिनों में कोरोना होने पर इसको घर में ठीक किया जा सकता है। कोरोना में हस्पताल जाने की जरूरत केवल उनको थी जिनको सांस लेने में दिक्कत शुरू हो चुकी हो, लेकिन हुआ ये कि रिपोर्ट के बाद हर कोई हस्पताल में पहुंच गया और हस्पतालों पर इतना भार डाल दिया गया कि डॉक्टर करें भी तो क्या। सांस लेने में दिक्कत होना भी केवल एक परिस्थिति में नुकसान दायक था कि जब वायरस गले में न रहकर सीधे सांस के साथ फेफड़े में प्रवेश कर जाए व उनको जुखाम व बुखार के संकेत शुरू में न मिले। ऐसे ही लोगों को डॉक्टर सिटी स्कैन का परामर्श दे रहे थे, लेकिन हुआ ये कि हर कोई पहले ही सिटी स्कैन करने के लिए पहुंच गया। जबकि जिनको शुरू में जुखाम, भुखार, गले में दर्द जैसे लक्षण थे उनको 4-5 पांच दिन में घर पर ही राहत मिल सकती थी।

मृत्यु दर क्यों बढ़ी ? हस्पतालों पर पड़ने वाला अतिरिक्त दबाव मौतों में हुई वृद्धि का जिम्मेदार है। दरअसल, जिन लोगों को हस्पताल सुविधाओं की जरूरत थी उनके साथ साथ बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी हस्पताल भर्ती होने पहुंचे जिनको न तो ऑक्सीजन की जरूरत थी और न ही रेमडिसिवर जैसी दवाओं की। हस्पतालोंमें काम करने वाले नर्सिंग स्टाफ व डॉक्टरों पर बेवजह का दबाव बढ़ गया जिससे जरूरतमद मरीज को मिलने वाले समय में गिरावट आई और दवाओं की जमाखोरी से कालाबाजीरी ऊपर उठ गई। जरूरतमंद लोग एम्बुलेंस में ही ऑक्सिजन के सहारे बैठे रह गये और जिनको कोरोना के सामान्य लक्षण थे उन्होंने हस्पतालों के बेड पर डेरा डाल लिया। परिणाम ! लोग हस्पतालों के बाहर ही दम तोड़ने लगे या देरी से बेड मिलने पर हस्पतालों के अंदर दम तोड़ने लगे।

सरकार कहाँ विफल रही ? सरकार मुख्यतः दो जगह पर फेल हुई। पहला नवम्बर 2020 के बाद सतर्कता में कोताही और दूसरा चुनावी रैलियां और धार्मिक आयोजन या सामूहिक जमावड़ा। इसके आलवा जो लोग वैक्सीन को बड़ा कारक बता रहे हैं या हस्पतालों की कमी को कारण मान रहे हैं, कोई बड़ा कारण नही है। केंद्र सरकार की सबसे बड़ी गलती यह रही कि 10 अप्रैल से 30 अप्रैल तक सम्पूर्ण लॉक डाउन नही किया और दूसरा हस्पतालों पर पड़ने वाला अतिरिक्त भार कम नही किया। सरकार इतना कर लेती और लोगों में भरोसा बनाती कि साधारण लक्षणों पर होम इसोलेशन में रहें, डॉक्टरी मदद घर पर ही दी जाएगी और सांस लेने में दिक्कत होने पर ही हस्पताल आएं तो इससे मृत्यु दर पर अंकुश लगया जा सकता था। वैक्सिनेशन बहुत बड़ा मुद्दा नही है क्योंकि कोरोना वैक्सिनेशन के बाद भी हो ही रहा है और अगर जागरूकता नही होगी तो उस स्थिति में भी लोग हस्पतालों का रुख करेंगे। केंद्र सरकार लोगों में भरोसा नही जगा पाई जिस कारण अधिकांश लोग सिर्फ कोरोना के नाम पर ही डरकर मर गए।