कहते हैं जहां भेड़चाल या भिड़चाल ही सबकुछ समझ ली जाती है, उस राज्य का राजा अपने कौशल में पारंगत होता है। मोदी को उनके विरोधी कहते हैं कि उन्होंने शिक्षा नही ली है, उनका अंग्रेजी बोलने का लहजा और उनके कई पुराने साक्षात्कार इस तरफ इशारा भी करते हैं कि शायद उन्होंने शिक्षा नही ली। राजनीति में अच्छी पकड़ और प्रसिद्धि के बाद किसी तरह से शिक्षा के प्रमाण पत्र हासिल कर लिए। लेकिन एक बात जो मोदी को औरों से अलग करती है वह ये कि मोदी मौकों को भुनाने में माहिर हैं, इसमें कोई दोहराई नही है। 2014 के चुनाव से पहले मोदी जानते थे कि भारतीय स्कूली शिक्षा में विश्लेषण की क्षमता नही है और अधिकांश भारतीय या तो स्कूली शिक्षा तक ही पढ़े हैं या अनपढ़ हैं। भारत में शिक्षा का के प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है जिसमें आप केवल परीक्षा देने ही विश्विद्यालय में जाते है, आम तौर पर लोग इसको प्राइवेट (डिस्टेंस) शिक्षा कहते है। दरअसल ऐसी शिक्षा के कोई मायने नही होते हैं और भारत में बदकिस्मती से अधिकांश नागरिक ऐसा करते हैं। ऐसे युवा बौद्धिक विश्लेषण में कमजोर होते हैं और उनका तुलनात्मक विश्लेषण इतना कमजोर होता है कि उनको बात बिगड़ने के बाद ही सही और गलत का अहसास होता है।

मोदी इस बात को अच्छे से पकड़ गये थे। उन्हें पता चल चुका था कि सत्ता में वापसी के लिए 30% लोग उनके साथ खड़े हैं बस उनको रास्ता दिखाने की जरूरत है। मोदी जानते थे कि भीड़ का कोई चेहरा नही होता इसलिए भीड़ में यह पता करना कि कौन शिक्षित है और कौन अशिक्षित, मुमकिन नही होगा। इसका एक बड़ा फायदा यह होगा कि भीड़ देखकर पढा लिखा युवा भी उनकी तरफ आकर्षित होगा, ये बात मोदी जानते थे। बस उनका काम आसान हो गया था और उनको केवल भीड़ इक्कठा करनी थी और उसका फिल्मीकरण करके समाज के हर वर्ग तक अपनी बात पहुंचानी थी। यही वजह है कि मोदी जहां भी रैली करते हैं वहां भीड़ पैसों से जुटाई जाती है क्योंकि इसका असर उन लोगों पर भी पड़ता है जो घर में बैठकर टेलीविजन या अखवार देखते हैं।

यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृति होती है कि उसको हार पर अपना अपमान महसूस होता है। 2014 में हर तरफ मोदी मोदी हो रहा था तो विपक्षी दलों के वोटर को लगा कि कहीं मेरे अकेले वोट करने से कहाँ ये जीत जाएगा, और प्रत्याशी की हार के बाद जो आसपड़ोस है उसमें लोग चिढाएंगे वो अलग। इसी शंका के चलते बहुत बड़ी संख्या में वोटर भाजपा की तरफ चला गया बिना इस विश्लेषण के कि विपक्ष अगर कमजोर होगा तो तानाशाही बढ़ जाएगी। प्रजातांत्रिक या गणतंत्र देशों का सीधा सा नियम होता है, या तो पक्ष और विपक्ष में समानता बनाये रखो या फिर वोट सत्ता पक्ष को करो लेकिन दृढ़ता से खड़े विपक्ष के साथ रहो। बदकिस्मती से भारत की राजनीति में ऐसा कुछ नही है।



मोदी परिस्थिति को भांप गये और उन्होंने चुनावी रैलियों को इवेंट में बदल दिया। मोदी मात्र 43% वोट प्रतिशत के साथ भाजपा के प्रत्याशियों को जिताने में कामयाब रहे और बाकी जगह गठबंधन की सरकार बनी। इसके बाद मोदी कैमरे की ताकत को पहचान गये थे इसलिए उन्होंने भारत के मुख्य मीडिया को अपनी तरफ झुका दिया जिससे उनका नाम 24*7 चलने लगा। बच्चे-बच्चे को मोदी की आवाज और चेहरे से परिचित करवाया गया, जिससे उनकी लोकप्रियता को निखारा जा सके। अगर ऐसा नही है तो याद कीजिये आपको देश में पिछले कितने प्रधामन्त्रियों की आवाज और चेहरे याद हैं ? शायद एक या एक भी नही । उस एक में भी प्रमुख्यता से इंदिरा गांधी ही होंगी क्योंकि उन्होंने भी कुछ ऐसा ही कारनामा किया था बस विचार इतने गिरे हुए नही थे जैसे कि आज की राजनीति में देखने को मिलते हैं। हालांकि 43% वोट की जीत कोई बहुत बड़ी नही थी लेकिन मोदी उसको बड़ा दिखाने में कामयाब रहे और साथ ही उन्होंने बिकने वाले नेताओं में यह भरोसा भी जगाया कि आने वाले दिनों में भी शासन हमारा ही होगा।

अंजाम यह हुआ कि जिन नेताओं का अस्तित्व केवल सत्ता से ही जुड़ा हुआ और बिन सत्ता के उनका कोई मूल्य नही, ऐसे विपक्षी नेता अपने दल छोड़कर भाजपा में सम्मिलित होते चले गये। इस घटना के बाद विश्लेषणहीन जनता को ये लगने लगा कि वास्तव में राजनीति अपने साफ चरित्र पर आ गई है लेकिन उनको यह पता नही चला कि नेता कितने करोड़ लेकर भाजपा में शामिल हुआ। इसको जनता का अंधापन कहते हैं और अंधों के बीच शासन करना उतना ही आसान है जितना की आत्मा को शरीर में भ्रमित करना। इसका मतलब ये नही है कि विपक्ष में साफ चरित्र वाले लोग हैं, न ऐसा बिल्कुल नही है। यह केवल यह दर्शाता है कि भारतीय जनता में विश्लेषण विवेक की कमी है।