उत्तराखंड सरकार ने कोरोना में अनाथ होने वाले बच्चों को 3000 रुपये प्रति माह की सुरक्षा देने का निर्णय लिया है। सरकार के अनुसार यह मदद 21 वर्ष की आयु तक बच्चों के लिए शिक्षा और भरण पोषण के लिए मुख्यमंत्री वात्सल्य योजना के तहत दिया जाएगा। लेकिन अब सरकार पहले यह सुनिश्चित करना चाहती है कि अगर किसी कारणवश माता-पिता की मृत्यु हो जाती है तो ऐसा बच्चा किस रिश्तेदार या सम्बन्धी के पास ज्यादा सुरक्षित महसूस करेगा, इसके लिए अभिभावकों की सहमति जीवित रहते ही ले ली जाएगी।

यह चर्चा महिला कल्याण निदेशालय की आनलाइन बैठक में सोमवार को हुई। जिसमें महिला व बाल कल्याण निदेशक मेजर योगेंद्र यादव, जिला प्रोवेशन अधिकारी व्यौमा जैन सहित प्रदेश भर के पदाधिकारी शामिल हुए। आनलाइन बैठक के दौरान टिहरी से सवाल पूछा गया कि बच्चों को गोद लेने की संबंध में इंटरनेट मीडिया पर अपील की जा रही है। कोरोना महामारी से माता-पिता की मौत होने के बाद इस तरह की अफवाह उड़ रही है कि कोई भी व्यक्ति बच्चों को गोद ले सकता है। जिसे महिला व बाल कल्याण निदेशालय के अधिकारियों ने गलत बताया। उन्होंने कहा कि बच्चों को गोद लेने की प्रक्रिया शासन से निर्धारित की गई है। उसके उलट किसी भी प्रकार की अपील गलत है। 

अब नये नियमानुसार, कोरोना संक्रमित होने की अवस्था में  चिकित्सा स्टाफ एक फार्मेट पर इस बारे जानकारी ले सकता है कि यदि किसी कारणवश उनकी मौत होती है तो बच्चे किस व्यक्ति या रिश्तेदार के पास ज्यादा सुरक्षित महसूस करेंगे। बेहतर देखभाल व सुरक्षा के हिसाब से जानकारी माता-पिता से मिलने के बाद बच्चों को गोद देने की समस्या आसान हो जाएगी और बच्चे के सुरक्षित रहने की संभावनाएं भी अधिक होंगी। यह कोई गलत कदम नही है क्योंकि ऐसा फॉर्म पहले भी मरीजों से भरवाया जाता रहा है जिसमें ऑपरेशन होने पर मरीज अपनी जिम्मेदारी खुद तय करता है। हालांकि यह बच्चों की सुरक्षा वाला तथ्य एक नया विचार है लेकिन सार्थक कदम है।