देश की आवश्यक सेवाओं पर सरकार का नियंत्रण न होना, शायद कोरोना काल में केंद्र व राज्य की सरकारों को अच्छे से समझ आ गया होगा। नागरिकों के प्रति सरकार के क्या कर्तव्य हैं जिनका निर्वाहन सरकार आपने अधिकार क्षेत्र से ही कर सकती है इसका महत्व भी इसी संक्रमण काल में लोग व राज्य की सरकारों को समझ में आया है। कहते हैं न हर बुरा वक्त बहुत कुछ सीखा के जाता है, निजीकरण का ढोल पीटने वालों को जब ऑक्सिजन, दवा और बेड तक नही मिले और मिले तो कई गुना दाम चुकाने पर तो शायद समझ आया होगा कि निजीकरण क्या होता है। सरकार ने अगर सरकारी संस्थानों पर सही से ध्यान केंद्रित किया होता और उनकी जवाबदेही तय की होती तो स्थिति इतनी दैनीय नही होती। यह केवल स्वास्थ्य क्षेत्र की ही बात नही है तमाम वो क्षेत्र जो मानव जाती के उत्थान के लिए आवश्यक है, में सरकार की जवाबदेही होनी चाहिए। ऐसे क्षेत्रों में प्रमुख्यता से शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंक, यातायात, मंगाई और जनसँख्या नियंत्रण जैसी आधारभूत जरूरतों पर तेजी से काम करने की जरूरत। कोई भी सरकार अगर पांच वर्षों में इन छः बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित करे तो देश में रोजगार का संकट स्वतः खत्म होने लगेगा। सरकार अपनी गलत नीतियों से खुद ही अपने ऊपर अतिरिक्त भार बढ़ा रही, सरकार खर्च तो कर रही है लेकिन बिना नीति के खर्च किया गया पैसा व्यवस्थाएं कम और लाचारी ज्यादा पैदा करता है।

कोरोना काल में ऐम्स जैसे हस्पताल किस भूमिका में हैं, ये किसी से छुपा नही हुआ है। अगर एक राज्य में एक ऐम्स और चार बड़े हस्पताल भी सरकार के पूर्ण कंट्रोल में हों और वहां पर हर सुविधा उपलब्ध हो तो शायद स्थिति को अच्छे से मैनेज किया जा सकता था। हाँ, ये बात जरूर है कि भारत जैसी आवादी वाले देश के लिए बड़े पैमाने पर बीमारी से लड़ना इतना आसान नही है लेकिन निजीकरण करने से लड़ा जा सकेगा ये भी गलत भ्रांति है। निजीकरण के साथ साथ रिश्वतखोरी भी बढ़ती जाती है। इससे अच्छा है कि सरकार सरकारी कर्मचारियों से काम लेने की सही रणनीति बनाए और सरकारी सुविधाओं में तेजी से सुधार करे।

भारत में पैसे कि कमी नही है क्योंकि इस देश में वस्तु कर जैसी व्यवस्थाओं से पहले ही इस प्रकार से अर्थव्यवस्था का न्यूनतम चक्र बनाया गया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था आसानी से गिर नही सकती और गिरी भी तो उसको सम्भाल जा सकता है। यही वजह है कि बीते छः-सात वर्षों में भाजपा सरकार (मोदी सरकार) की गलत नीतियों के बाद भी देश चल रहा है। जब सरकार को लगता है कि अर्थव्यवस्था कम जा सकती है तो वह वस्तु कर बढ़ा देती है। यही वजह है कि पेट्रोल डीजल पर भारत में भारी टैक्स लिया जा रहा है। इतना ही टैक्स अगर पाकिस्तान और नेपाल सरकार भी अपने नागरिकों से वसूलती तो उनकी अर्थव्यवस्था भी आज के मुकाबले ठीक स्थिति में होती। भारत को भारत बनाये रखने में अहम भूमिका भारत के आम नागरिक की है न की किसी राजनेता की। फिर समानता की इस लहर में अगर निजीकरण जैसी दीमक लगा दी जाएगी तो कुछ लोग तो बहुत ऊपर चले जाएंगे और जो निचला तबका है उसकी जीवन के लिए आवश्यक सेवाओं से पहुंच कम हो जाएगा, जैसा की आप लोग कोरोना के इस दौर में देख ही रहे होंगे। गरीब हस्पताल तक जा ही नही रहा है, वह या तो कोरोना से घर पर ही लड़ रहा है या मर रहा है। हाँ, अगर उसके पास सरकारी हस्पताल जैसी उचित व्यवस्था होती तो वह जरूर जाता।