नरेंद्र मोदी भारत के 16वें प्रधनमंत्री हैं। इससे पहले ऐसे प्रधानमंत्री जिन्होंने 10 वर्ष या उससे अधिक देश पर शासन किया में- जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और मनमोहन सिंह प्रमुख्यता से हैं। भारत जैसे जैसे तरक्की करता रहा वैसे वैसे भ्रष्टाचार भी बढ़ता गया, इसमें कोई दोहराई नही है। इसको ऐसे भी समझ जा सकता है कि जैसे जैसे आधुनिकता बढ़ी भ्रष्टाचार भी बढ़ता गया। इसका साफ आईना यह था कि सूचना संचार के साथ साथ पारदर्शिता बढ़ने लगी तो राजनीति में बैठे लोगों के चेहरे जनता को दिखने लगे। लेकिन उस दौर से आज के दौर में कुछ बातें बड़ी असहज ढंग से बदल गई हैं या यूं कहे की बदली गई है।  

भारत में जब संचार व्यवस्था इस स्तर पर नही थी कि आप हाथ से रखे फोन से ही दुनियां में घटित गतिविधियों का पता कर सकते हैं, नेताओं में जनता के प्रति झुकाव और समर्पण था। पर्दे के पीछे होने के बाबजूद भी नेता जनता से डरते थे और विकास कार्यों की समीक्षा के समय गिने चुने पत्रकार या अखवार घरानों से डरते थे। लेकिन आज स्थिति कुछ नही बल्कि 90% विपरीत है। पत्रकारिता नेताओं की गुलाम है और झूठ को सच में पड़ोसने के लिए तरह तरह के आधुनिक उपकरणों और संसाधनों का उपयोग किया जा रहा है। देश में ऐसे भी कई प्रधानमंत्री हुए है जिनका कार्यकाल 10 माह से लेकर 02 से 03 साल ही रहा। इसकी दो वजह हो सकती हैं, या तो उनको राजनीतिक दबाव से हटाया गया (जैसे सरकार का गिरना या पार्टी का आंतरिक दबाव) या फिर उनमें कार्यकुशलता नही थी। लेकिन फिर भी ऐसे प्रधानमंत्रियों ने किसी प्रकार असहजता नही दिखाई क्योंकि उनको लोकतांत्रिक देश के मूल्यों की जानकारी थी।

कई बार राजनीति में आपका विरोध सही बातों पर भी होता है। लेकिन इसका यह अर्थ नही की आप असहज हो जाएं और कुछ ऐसा करें कि वह आपके पद की गरिमा के खिलाफ हो। पिछले कार्यकालों में ऐसा कई बार हुआ लेकिन बातें जनता तक नही आई जिससे लोकतंत्र के सामंजस्य में कोई असहनशीलता पैदा नही हुई। लेकिन वर्ष 2014 में जबसे मोदी प्रधानमंत्री बने है, प्रधानमंत्री की गरिमा को कई बार नीचे गिरना पड़ा है। आखिर एक प्रधनमंत्री इतना डरफोक कैसे हो सकता है कि वह कुछ पत्रकारों के सवालों से बचता फिर रहा है, एक प्रधानमंत्री विदेश दौरों पर बिना पत्रकारों के जाता है और विदेश नीति पर चर्चा से बचता है। एक प्रधनमंत्री इतना कमजोर कैसे हो सकता है कि वह ट्विटर पर अपना विरोध नही झेल सकता है, या यूट्यूब पर उसके द्वारा की गई मन की बात को जनता द्वारा नापसंद किये जाने पर आंकड़ों का छुपाया जाना। लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री की गरिमा को ऐसे कृत्यों से जो आघात हुआ, इससे पहले कभी नही देखा गया।

लोकतांत्रिक देश एक ऐसे प्रधानमंत्री की कल्पना कभी नही करता जो जनता और जनता में फर्क पैदा करे। स्वतंत्रत भारत के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि केंद्र सरकार ने गैर स्वयं शासित प्रदेशों के साथ फंड और सुविधा आवंटन में भेदभाव किया हो। भारत की संस्कृति भी इस ओर इशारा करती है कि राजा हर युद्ध को लड़ने नही जाते थे ऐसे में पप्रधानमंत्री का हर राज्य चुनाव में कूदना और सरकारी धन का दुरुपयोग करना भी प्रधानमंत्री की गरिमा को तार तार करता है। भारत में एक इतने कमजोर प्रधानमंत्री की कल्पना कभी नही कि थी एक राज्य चुनाव में हार के बाद वह इतना तिलमिला जाए कि राज्य के मौलिक अधिकारों के साथ छेड़छाड़ करे। इतिहास गवाह है कि दुर्जन राजाओं का साथ भी कुछ प्रतिशत प्रजा ने दिया है लेकिन अंत में उस प्रजा और राजा के साथ क्या हुआ, ये भी भारत जैसे लोकतांत्रिक देश को नही भूलना चाहिए।

इस धरती पर हर किसी का शासन हमेशा न रहा और न रहेगा लेकिन इतिहास हर किसी का लिखा गया। सवाल ये है कि भारत में ऐसा प्रधानमंत्री जो चुनावी हार से असहज हो जाता है, जो अपने विरोध पर असहज हो जाता है और जन संचार के साधनों को प्रभावित करता है। जो जनता और जनता में फर्क करता है, जो सिर उठाने वाले के सिर को हर घड़ी कुचलने की चाह रखता है और चाहता है कि जो वो कहे वही हो। ऐसे व्यक्ति का इतिहास जब लिखा जाएगा तो वह एक राजा के पद पर बैठे नश्वर को शोभा नही देता। यह एक महान विरासत सम्राज्य पर लगने वाला वह ग्रहण है जिसने दिन के उजाले को रात्रि चांद के उजाले के बराबर कर दिया है। क्या इतिहास कभी ऐसे शासक को माफ करेगा ?