उत्तराखंड सरकार की मूर्खता की वजह से वजह से पहले पहाडीं क्षेत्र पर सुविधाओं के आंकलन के बिना ही लोगों को बिना किसी रुकावट के जाने दिया गया और अब जब कोरोना के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं तो सरकार की सांसे फूल रही हैं। कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर से जूझ रहे उत्तराखंड में अब गांवों ने सरकार की चुनौती बढ़ा दी है। खासकर, पहाड़ को लेकर चिंता अधिक बढ़ गई है, जहां संक्रमण के मामले निरंतर सामने आ रहे हैं। उस पर वहां स्वास्थ्य सेवाएं नाममात्र की ही है।  

देश के यशस्वी प्रधानमंत्री ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि जनता मरती है तो मरे टीकाकरण तो राज्यों को खुद ही करना पड़ेगा। इधर उत्तराखंड में टीके की कमी के कारण कई जगहों पर 45+ आयु का टीकाकरण भी बन्द कर दिया गया है। ब्लैक फंगस नामक वायरस की एंट्री राज्य में और हो गई है जिससे मुश्किल और बढ़ गई है। टेस्टिंग, टीकाकरण और जनजागरण के लिए ग्राम पंचायत स्तर पर ग्राम प्रधानों की अध्यक्षता में गठित कोविड नियंत्रण समितियों को और अधिक सक्रिय किया जा रहा है।  

विषम भूगोल वाले पर्वतीय क्षेत्र के गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं का हाल किसी से छिपा नहीं है। ब्लाक स्तर पर प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तो हैं, मगर इन्हें खुद उपचार की जरूरत है। सूरतेहाल, गांवों में संक्रमण को फैलने से कैसे रोका जाए, यही सबसे बड़ी चुनौती है। विशुद्ध रूप से नौ पर्वतीय जिलों टिहरी, पौड़ी, उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, चंपावत, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ व बागेश्वर को ही देखें तो यहां संक्रमण के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। ऐसे में संक्रमितों के उपचार, लक्षण वाले व्यक्तियों की जांच आदि को लेकर चुनौती बढ़ गई है।  

क्या है पहाड़ों पर जाँच की स्थिति:- 01 से 15 मई तक की तस्वीर देखें तो इस अवधि में टिहरी जिले में 5154, पौड़ी में 4856 व अल्मोड़ा में 3279 व्यक्ति कोरोना संक्रमित पाए गए। अब टेस्टिंग पर नजर डालते हैं। 15 दिन में सबसे अधिक 15 विकासखंडों वाले पौड़ी जिले में 18507, टिहरी में 20668 व अल्मोड़ा में 21317 व्यक्तियों की कोरोना जांच हुई। ऐसी ही तस्वीर दूसरे पर्वतीय जिलों की भी है। सवाल ये है कि चुनावी रैलियों के लिए नेता या उनके समर्थक घर घर पहुंच जाते हैं लेकिन अब जब कि जनता को जरूरत है तब नेता अपने क्षेत्र में देखने भी नही जा रहे।

राज्य को सम्पूर्ण लॉकडाउन की जरूरत- उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थिति और सुविधाओं का अभाव देखते हुए यह फैसला अप्रैल में ही ले लिया जाना चाहिए था और 45+ आयु के लोगों को उनके गांव में ही टीका उपलब्ध करवाया जाना चाहिए था। लेकिन उत्तराखंड सरकार फैसले लेने में पूर्ण रूप से फेल नजर आई। लोगों को निरन्तर आवाजाही से पहाड़ी क्षेत्रों में संक्रमण तेजी से हावी हुआ और लोगों को अपनी चपेट में ले लिया। हस्पतालों के नाम पर पहाड़ी क्षेत्र में केवल कुछ ही इमारतें हैं लेकिन इनमें भी डॉक्टरों का अभाव है। पहाड़ समीक्षा लगातार लॉक डाउन के सम्बन्ध में लिख रहा है लेकिन सरकार को राजस्व की फिक्र ज्यादा नजर आती है बनस्पत लोगों की जान के। यही वजह है कि राज्य में मृत्यु दर तेजी से बढ़ रही है।