कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर में केंद्र सरकार की ओर से गरीब परिवारों को दो माह का निश:शुल्क राशन एक साथ दिया जा रहा है। खाद्य सुरक्षा योजना (एनएफएसए) और बीपीएल के कार्डों में प्रत्येक यूनिट में तीन किलो गेहूं और दो किलो चावल मिल रहा है। चावल की गुणवत्ता एकदम घटिया है तो कई बोरों में गेहूं भी घुन लगा हुआ है। खराब राशन मिलने से उपभोक्ताओं में सरकार के खिलाफ आक्रोश है। सरकारी सस्ते गल्ले की दुकानों से गरीबों को मिलने वाले फ्री राशन की गुणवत्ता बेहद घटिया है। चावल में कंकड़ पत्थरों की भरमार है तो कई बोरों में गेहूं भी काफी खराब निकल रहा है। कोरोना काल में जबकि गरीब लोग सरकार के भरोसे बैठे हैं खराब राशन दिया जाना उन्हें काफी अखर रहा है।

तीलू रौतेली पुरस्कार प्राप्त समाजिक कार्यकर्ता रीता गहतोड़ी ने बताया कि उपभोक्ताओं का पूरा परिवार चावल में पड़े पत्थरों को बीनने में लगा हुआ है। उन्होंने बताया कि 20 किलो चावल में पांच से छह सौ ग्राम तक पत्थर निकल रहे हैं। यह स्थिति गरीबों के लिए काफी निराशा जनक है। उन्होंने शीघ्र इसकी शिकायत जिलाधिकारी से करने की बात कही।  गरीबों के सामने सरकारी सस्ते गल्ले से मिलने वाले गेहूं को पीसने की दिक्कत पैदा हो गई है। लोगों का कहना है कि चक्कियां बंद होने से वे अपने खाने के लिए गेहूं और दुधारू पशुओं के लिए दाना भी नहीं पीस पा रहे हैं।

लोहाघाट विकास खंड की ग्राम पंचायत पऊ, फोर्ती, कोलीढेक, कर्णकरायत, पाटी विकास खंड के खेतीखान, पाटी, भिंगराड़ा एवं बाराकोट विकास खंड की कई सरकारी सस्ता गल्ला की दुकानों से राशन लेने वाले उपभोक्ताओं ने बताया कि चावल में बड़ी संख्या में बालू के कंकड़ों की भरमार है। यही हाल गेहूं का भी है। चक्की चलाने वाले चम्पावत के डडा बिष्ट निवासी जीवन सिंह रावत ने बताया कि उनकी दुकान में गेेहूं के कट्टों का ढेर लगा हुआ है। लोग रात में भी गेहूं पीसने की गुहार लगा रहे हैं लेकिन चाहकर भी ग्रामीणो की मदद नहीं कर पा रहे हैं। 

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