बेलगाम भ्रष्टाचार पर कोई लगाम नही, केवल चुनावी उदघोष भर रह गया भ्रष्टाचार। दोषियों के खिलाफ सख्त रवैया का बड़ा अभाव, समाजिक तानेबाने पर बुरा प्रभाव।

केंद्र से लेकर भाजपा शासित राज्यों का दावा है कि उनकी सरकार के बाद भ्रष्टाचार पर लगाम लगी है। हालांकि इस बीच कई भ्रष्टाचार के मामले प्रकाश में आ चुके हैं लेकिन फिर भी पहाड़ समीक्षा कुछ तथ्यों पर प्रकाश डालना चाहता है जहां भाजपा के राज में भी कोई मुक्ति नही मिली, उल्टा कीमतों में और तेजी देखने को मिली है। राज्य में लगभग हर सरकारी योजना या लाइसेंसी दस्तावेज पर धड़ले से भ्रष्टाचार खोरी चल रही है। अब लोगों को इसकी आदत हो चुकी है इसलिए इस खर्चे को लोग पहले ही अपने बजट में जोड़कर चलते हैं। दिक्कत इस बात कि है कि 50 से 80 हजार और उससे अधिक सरकारी तनख्वाह पाने वाले लोग इस कड़ी में प्रमुखता से हैं।

उत्तराखंड में ग्रामीण क्षेत्रों या शहरी क्षेत्रों में विकास कार्यों पर जेई/एई का फिक्स लाभ प्रतिशत है जो पूर्व से ही चलता आ रहा है। राज्य में फार्मेसिस्टों को लाइसेंस रिन्यू या बनाने के लिए भी मोटा पैसा वसूला जा रहा है। इसके अलावा आरटीओ भी एक लाइसेंस को बनाने के 5 से 7 हजार वसूल रहा है। समस्या यह है कि अगर न दें तो सरकारी पदों पर बैठे लोग कोई न कोई छोटी सी कमी निकालकर बाहर कर देतें हैं। भ्रष्टाचार मुक्त करने के दावों के साथ सत्ता में आई भाजपा सरकार इन्हीं दो चार विभागों पर काबू पाने में पूर्ण रूप से फेल है। इसके अलावा कई अन्य क्षेत्र हैं जहाँ भाजपा के राज में ही भ्रष्टाचार में तेजी से वृद्धि हो रही है जबकि महंगाई अपने चरम पर है।

आज स्थिति ये है कि बैंक लोन करवाने पर भी कुछ प्रतिशत बैंक कर्मी ही खुले आम मांग रहे हैं। कुछ हद तक लोग भी भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार हैं क्योंकि पैसे वाले लोग समय खराब करने से बेहतर विकल्प रिसवत को मानते हैं। लेकिन इसका दुष्परिणाम यह है कि जिसके पास पैसा नही है उसको भी इस भ्रष्टाचार के जाल से गुजरना पड़ता है। अब क्योंकि सरकार के पास ऐसे भ्रष्टाचारी लोगों के लिए दण्ड की कोई ठोस रणनीति नही है इसलिए जनता में विश्वास पैदा नही होता। अधिकांशतः देखा गया है कि एक लंबी समयावधि को दोषी की सजा में खराब करना पड़ता है जबकि दोषी कुछ ही समय में जमानत पर बाहर आ जाता है।




आपको यह जानकर बेहद हैरानी होगी कि जनता द्वारा किए गये निःशुल्क रक्तदान से भी स्वास्थ्य विभाग भ्रष्टाचार कर लेता है। आज मुश्किल यह है कि बहुत कम ही क्षेत्र ऐसा बचा है जहां भ्रष्टाचार नही है और 98% सरकारी रूपरेखा भ्रष्टाचार से पीड़ित है। एक मोटी रकम हर माह सरकार की तरफ से वेतन पाने वाले कर्मचारियों की बड़ी संख्या इस कार्य में लिप्त है फिर भी सरकार कहती है कि राज्य में भ्रष्टाचार पर रोक है तो मतलब साफ है कि इन पैसों में बड़ी जान है। आज हर चीज पर टैक्स चुकाने के बाद एक टैक्स भ्रष्टाचार का भी है, यह अब सरकारों को खुद ही ऐलान कर देना चाहिए। 



सरकारी तंत्र को हमने एक ऐसी दीमक के रूप में इजात कर लिया है जो सामाजिक तानेबाने को अंदर से खोखला कर रही है लेकिन बाहरी संरचना अभी भी सुरक्षित लग रही है। इसका सामाजिक स्तर पर एक बहुत बड़ा दुष्प्रभाव है जो अभी इसलिए नजर नही आ रहा क्योंकि गरीब रेखा से नीचे जीवन निर्वह करने वालों के लिए भी सरकार के पास एक भ्रष्टाचार युक्त राशन प्रणाली है। यही सबसे बड़ी वजह है कि जहां लोगों को आवाज उठाने की जरूरत होती है वहां उनको मुफ्त की भ्रष्टाचार वाली नीति उनका मुह बन्द कर देती हैं। ऐसी कई योजनाएं हैं जो लोगों को अंदर ही अंदर दबा रही हैं। यही समाजिक संरचना का वह पहलू है जो अमीर को और अमीरी और गरीब को और गरीबी की तरफ धकेल रहा है।