आपदा को चार माह बीत गए लेकिन सरकार अभी तक आपदा प्रभावित गांव का विस्थापन करने में नाकाम, लोग जान बचाने को मजबूर है तो ले रहे है गुफाओं में शरण। लेकिन सवाल कि क्या गुफाएं सुरक्षित है ?

 

फरवरी में हुई जलप्रलय के बाद लोगों में काफी दहशत का माहौल है। इस प्रलय के बाद गांव के पास बह रही ऋषिगंगा नदी से भू-कटाव लगातार बढ़ रहा है। अब भय इस कदर है कि बारिश आते ही गांव वाले अपने घरों को छोड़ पहाड़ में गुफाओं में शरण ले रहे हैं। बुधवार से क्षेत्र में हो रही बारिश के चलते ग्रामीण दिन में भले ही घर लौट रहे हों, लेकिन वह रात बिताने गुफाओं में जा रहे हैं। सरकार ने दो चार दिन तो खूब ढोल बजाए लेकिन उसके बाद कोई सुद नही ली।

रैणी गांव के ग्रामीण बताते हैं कि खेत तो कटाव की भेंट चढ़ ही रहे हैं, मकानों में भी दरार आ चुकी है। पैदल मार्ग क्षतिग्रस्त है। वह बताते हैं कि गांव में कुल 54 परिवार हैं। इनमें से 14 परिवारों के मकान और खेत तो आपदा में पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। शेष परिवारों की स्थिति भी बेहतर नहीं हैं। इसलिए जान की हिफाजत के लिए लोग अपने घरों को छोड़कर गुफाओं में शरण ले रहे हैं। पहाड़ समीक्षा ने कुछ दिन पहले 2011 में बने आपदा प्रबंधन एक्ट पर एक लेख प्रकाशित किया था। उस लेख से पता चलता है कि जिन गांवों का विस्थापन होना था अभी तक उस पर सरकार ने कोई कार्य नही किया है। चुनाव नजदीक है इसलिए मतदाताओं के लिए सुनहरे सपने परोसने की कोशिश हो रही है। सच्चाई रैणी गांव जैसे लोगों की दिनचर्या है।

राज्य में मानसून की सक्रियता दर्ज हो चुकी है इस लिए रैणी गांव के लोग भयभीत है। अधिकतर ग्रामीणों ने अपने बच्चों को रिश्तेदारों के पास भेज दिया है। ग्रामीण अपने घरों में रात बिताने से डर रहे हैं। ग्रमीणों द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार दिन में लोग अपने खेतों व घरों में काम के लिए लौट रहें है लेकिन रात को फिर गुफाओं में शरण ले रहें है। इस बाबत लोग प्रशासन से गुहार भी लगा रहें है लेकिन अभी तक कोई उचित करवाई नही की गई है।