पहले कुंभ और फिर कोरोना की दूसरी लहर के प्रकोप से निपटने में व्यस्तता रहे तीरथ सिंह की दिल्ली दौड़ बीच में ही अटक गई थी। राज्य में 2022 में विधनसभा चुनाव होने है ऐसे में चुनाव से कुछ समय पहले ही मुख्यमंत्री का पदभार सम्भालने वाले तीरथ सिंह के लिए राह इतनी आसान नही होने वाली है। मुख्यमंत्री कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार मुख्यमंत्री दिल्ली में केंद्रीय मंत्रियों के साथ ही पार्टी पदाधिकारियों से मुलाकात कर विभिन्न विषयों पर विमर्श करेंगे। मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के दिल्ली पहुंचने के बाद मुलाकात का कार्यक्रम तय होगा। यही वजह है कि मुख्यमंत्री की दिल्ली से वापसी का कार्यक्रम तय होना बाकी है। मुख्यमंत्री शनिवार को शाम साढ़े चार बजे उत्तराखंड सदन में पर्यावरणविद स्वर्गीय सुंदरलाल बहुगुणा को श्रद्धांजलि देने के लिए वेबिनार में शामिल होंगे।

आपको बता दें कि तीरथ सिंह रावत ने मुख्यमंत्री पदभार सम्भालने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा तय किए गये मंत्रियों ले दायित्वों को निरस्त कर दिया था। तब से राज्य के मंत्री अपनी एक आंख मुख्यमंत्री की दिल्ली बैठक पर टिकाए हुए हैं। सूत्रों के अनुसार इस सिलसिले में एक दौर की कसरत हो चुकी है। लेकिन इस बारे में अभी भाजपा के केंद्रीय और प्रांतीय नेतृत्व से भी विमर्श किया जाना बाकी है। इस बात पर फैसला होना है कि मौजूदा परिस्थितियों और अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए किसको क्या दायित्व दिए जाएं।

मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के दिल्ली दौरे के दौरान उनकी विधानसभा सीट को लेकर भी चर्चा होने के आसार हैं। तीरथ अभी पौड़ी गढ़वाल सीट से सांसद हैं। उन्हें छह माह के भीतर विधानसभा चुनाव लड़ना है। वह कहां से चुनाव लड़ेंगे, इसे लेकर अभी उच्च स्तर पर फैसला लिया जाना है। माना जा रहा है कि इस मुद्दे पर निर्णय लिया जा सकता है।  साथ ही 2022 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए मुख्यमंत्री के सामने कम वक्त बचा है। ऐसे में जो विकास कार्यों को अंजाम देने की चुनौती सरकार के सामने है, उस पर भी चर्चा हो सकती है।

उधर एक समस्या दायित्व को लेकर भी है क्योंकि हाल ही में पश्चिम बंगाल में मिली करारी हार के बाद भाजपा चाहती है कि वर्तमान में कोई भी मंत्री दिए गये दायित्व से नाराज न हो। वरिष्ठ कार्यकर्त्‍ताओं को उनकी अपने-अपने क्षेत्रों में जनता में पकड़ समेत अन्य बिंदुओं की कसौटी पर परखने के बाद दायित्व दिए जाएंगे। क्योंकि भाजपा को पश्चिम बंगाल चुनाव से यह तो समझ आ गया है कि दूसरी पार्टियों के विधायक/मंत्री अपने खेमे में करने से जीत नही मिलने वाली है। इसलिए पार्टी पहले से मौजूद मंत्रियों में ही विश्वास पैदा करना चाहती है।