उत्तराखंड में पलायन एक समस्या है तो खत्म होते जंगल दूसरी समस्या। पहाड़ी क्षेत्रों से पलायन के बाद जहां खेती बंजर पड़ गई वहीं जंगल भी दीनहीन अवस्था में चले गये। पिछले एक दशक में पहाड़ समीक्षा ने कृतिनगर ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले कई जंगलों का विश्लेषण किया तो पाया की जंगल पिछले 10 वर्षों में और भी बुरे दौर से गुजर रहें हैं। जहां उम्मीद थी कि लोगों के पलायन के बाद जंगलों की दशा में कुछ सुधार होगा, वहां जंगल सर्वाधिक बर्बादी की कगार पर खड़ें हैं। 


आज जब जंगलों में न मवेशी हैं और न इंसान, ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि जंगलों को नुकसान कौन पहुंचा रहा है? क्या वन विभाग ने कभी इस ओर ध्यान केंद्रित किया ? अगर, नहीं! तो सवाल, क्यों ? हर साल सरकार वन विभाग पर करोड़ो खर्च करती है लेकिन अब ऐसा लगता है कि वन विभाग को खुद ही दीमक लग चुकी है। जिस तरह से जंगल सिर्फ झाड़ियों में सिमट रहे है उसे देखकर तो यही लगता है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की इतनी बड़ी पहल पर भी किसी ने कोई ध्यान नही दिया और नतीजा आज सबके सामने है।


पिछले 10 वर्षों में अधिकांश (जहां चीड़ ज्यादा संख्या में है)  जंगलों में 02% से भी कम चौड़े पत्ते वाले वृक्ष उगे हैं। जो चौड़े पत्तेदार वृक्ष पहले से थे उनको भी हर साल आग के बाद भारी क्षति पहुंची है। वन विभाग या ग्राम प्रधानों द्वारा नए वृक्ष लगाने का जो प्रयास भी किया गया, वह चीड़ की पत्तियों की भेंट चढ़ गया। आज हालात ऐसे हैं कि जंगलों में झाड़ियां और चीड़ के सिवाय कुछ दिखता ही नही। चीड़ एक ऐसा वृक्ष है जो आसपास की नमी को खींच लेता है और आस पास किसी पौधे को पनपने ही नही देता। 


मुख्यमंत्री रहते हरीश रावत ने चीड़ को लेकर एक अच्छा सुझाव दिया था लेकिन राज्य  के बुद्धिजीवी उस पर कोई काम नही कर पाए। उल्टा हर साल करोड़ो रुपया पौधारोपण पर बहाकर सो जाते हैं। हरीश रावत ने सुझाव दिया था कि धीरे धीरे चीड़ की संख्या को कम करके चौड़े पत्तेदार वृक्षों को बढ़ावा दिया जाए और जंगलों में ऐसे वृक्ष लगाए जिससे जंगली जानवर भी अपना भरण पोषण जंगलों में ही कर सकें और ग्रामीण क्षेत्रों की खेती को ज्यादा नुकसान से बचाया जा सके। लेकिन कंक्रीट की दुनिया में पले बढ़े कठोर बुद्धि वालों के भेजे में उनकी बात घुसी नहीं और योजना सिर्फ चर्चा में ही रह गई।


जंगलों के विकास के लिए आज भी देर नही हुई है। हमारे पास मनरेगा जैसी नीतियां पूर्व से ही हैं। हर साल पौधों पे करोड़ो का बजट बनाने से अच्छा है जंगलों में मनरेगा के तहत वृक्ष सुधार नियम बनाया जाय। जंगल की बाहरी सीमा को आग से सुरक्षित कर अंदर फलदार वृक्ष लगाए जाय और उनके संरक्षण के लिए मनरेगा के तहत कार्य आवंटन किया जाय। इस बात को समझने की जरूरत है कि जंगलों को इंसानों व जानवरों से ज्यादा खतरा नहीं है, बजाय चीड़ जैसे पौधे के। जंगल के हर क्षेत्र में झाड़ी का होना आग के लिए सबसे अनुकूल वातावरण का होना है। हाँ, झाड़ी जंगली जानवरों का आवास भी है लेकिन आवास सीमित ही होना चाहिए। क्योंकि आज जंगली जीवों की हत्या के लिए मजबूत कानून है इसलिए जनवरों का हरपल छुपे रहना भी बहुत जरूरी नही है। दूसरा आज जंगलों में मवेशी या इंसानी दखलंदाजी बहुत कम है।


बीते एक दशक के नतीजे चिंता जनक इसलिए भी हैं क्योंकि आज हमने हर जगह को सड़क जैसी सुविधा तो दी लेकिन उसके बदले पर्यावरण ने जो कीमत चुकाई है बल्कि यूं कहे चुका रहा है, उसका आंकलन सही नही है। आज बरसात का मापदंड पूरी तरह से हिला हुआ है और वाहनों की बढ़ती संख्या से चौड़े पत्तेदार वृक्षों के ऊपर इसका बड़ा दुष्प्रभाव हो रहा है। वहानो के चलने से निकलने वाला धूल व धुंआ चौड़े पत्ते वाले वृक्षों के पत्तों पर जम जाता है जिस वजह से उनकी फोटोसिंथेसिस (प्रकाश संश्लेषण) क्रिया को गहरा धक्का लगता है। अब क्योंकि समय पर बारिश नहीं हो रही इसलिए पत्तियां कई बार एक साल तक धूल से मुक्त ही नही हो पाती हैं। प्रकाश संश्लेषण क्रिया ठप या ना के बराबर हो जाती है ऊपर से जमीन में पानी की कमी, नतीजा मौत में बदल जाता है। यह कुछ ऐसा है जैसे आपका मुह सिल दिया जाय और उसके बाद आपकी नाक बन्द कर दी जाय। 


आब आप सोच रहे होंगे कि चीड़ कैसे जी रही हैं? चीड़ अपने पत्तों के रेखीय रूप की वजह से जी रही है। उस पर धूल बैठ ही नही पाती और दूसरा ऊंचाई जल्दी विकसित होने से पत्तियां जल्दी ही धूल की पहुंच से बाहर भी हो जाती हैं। चीड़ जमीन में एक बून्द पानी भी नही छोड़ता है इसलिए उसकी जड़ें तेजी से अधिक दूरी को नाप लेती हैं। ऐसा करने से उसको थोड़ा बहुत नमी कहीं न कहीं से प्राप्त हो ही जाती है। यूं समझ लीजिए चीड़ आज के नेता हैं जो अपने जीने के लिए व्यवस्थाएं बना ही लेते  हैं।