प्राकृतिक स्त्रोतों को फिर से पुनर्जीवित करने के लिए अगर आज सार्थक कदम नही उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियों को जल त्रासदी से गुजरना पड़ेगा ।

 

उत्तराखंड में गांव को नदीय जल योजना से जोड़ने का प्रयास बरसाती मौसम में घातक सिद्ध हो रहा है। यह एक ऐसी जल वितरण योजना है जिस पर सरकार ने उचित ध्यान केंद्रित नही किया। प्रायः देखा गया की इस पानी में मृत मछलियों के अवशेष या अन्य प्राकृतिक अवयव बहकर आते हैं। इस पानी के लिए कोई फिल्टर (छनाव) व्यवस्था नही है। जल जीवन मिशन के तहत पेजल कार्यों में तेजी तो आई लेकिन इस योजना में अभी भी कई खामियां हैं। यही वजह है कि अधिकांश क्षेत्रों में पाइप लाइन में सिल्ट इत्यादि सामग्री फंसने से पानी की सेवा ठप पड़ जाती है।

सरकार ने प्राकृतिक स्रोत के ऊपर से ध्यान हटा लिया है। नतीजा जिन दिनों नदी का पानी ग्रामीण क्षेत्रों को मिलता रहता है उतने दिन ग्रामीण क्षेत्र के पास के प्राकृतिक स्त्रोतों का पानी व्यर्थ बहता रहता है। अधिकांश स्त्रोतों को अच्छे इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है क्योंकि स्त्रोत या तो प्राकृतिक आपदा से दब गये हैं या जीर्णोद्धार के लिए सरकारी मदद का मुह ताक रहे हैं। इन स्त्रोतों पर उचित ध्यान कि कमी से जब कभी नदीय जल सेवा प्रभावित होती है तो ग्रामीण क्षेत्रों में पानी का संकट गहरा जाता है। सरकार को चाहिए था कि इन स्त्रोतों को बराबर रिचार्ज किया जाए, भले स्त्रोत से प्राप्त पानी को ही अतिरिक्त खाली दिनों में स्त्रोत के ऊपरी हिस्से में प्रवाहित क्यों न करना पड़े। दूसरा स्त्रोत के चारो तरफ ऐसे वृक्ष लगाए जाए जिनकी जड़ों में सर्वाधिक जल उत्पन्न करने की क्षमता हो। पहाड़ो पर बांज को इस दिशा में अच्छा वृक्ष माना जाता है।

सरकार ने जल मिशन के तहत दो बड़ी गलतियां की हैं। पहली कि बहते हुए नदियों को सीधे लिफ्ट करने का काम किया और टैंकों में कोई फिल्टर सुविधा नही बनाई। दूसरा इस कार्य के लिए बांधो के रिजर्वायर (जलाशयों) का चयन नही किया। बांधो के जलाशयों में पानी की गहराई के साथ वेग संतुलित होता है। इससे पाइपों में सिल्ट जैसी समस्या से छुटकारा मिल सकता था। कुछ क्षेत्रों में हैंडपंप अभी पानी का जरिया हैं लेकिन ऐसा अधिक देर तक नही चलने वाला है। क्योंकि पहाड़ी क्षेत्रों में बरसात कम हो रही है और भूमिगत जल का स्तर गिरता जा रहा है। प्रायः देखा गया है कि आज से 15-20 साल पहले जिन जगाहों पर पानी ऊपरी सतह पर था आज या तो ना के बराबर है या फिर वहां पर है ही नहीं।  

आज जरूरत है उन सभी स्रोतों को रिचार्ज करने की। लेकिन सवाल है कि बिना जल के ये कैसे सम्भव हो ? हमने पिछले कुछ सालों में करोड़ो का बजट चैक डैम बनाकर खराब कर दिया है। मनरेगा में कार्य करने का मतलब सिर्फ पैसा आवंटन नही होना चाहिए। आप ध्यान दीजिए, अधिकांश यानी 99% चैक डैम बरसाती मौसम में भी पानी को एकत्रित नही कर पा रहें हैं। सरकार ने पैसा दिया, मिट्टी खुदी देखी और काम पूरा हो गया। फायदा ? सिर्फ लोगों को लेबर बनकर पैसा मिला। लेकिन जमीनी रूप में कोई प्रगति नही हुई। चैक डैम कहां बनने चाहिए थे इस पर न ग्राम प्रधानों ने विचार किया और न सरकार ने। बस खानापूर्ति करके पैसा बांट दिया और उसी को विकास कहकर वाह वाही लूट ली।  

हमे अगर आने वाली पीढ़ियों का वास्तव में संरक्षण देना है तो सुविधाओं के वर्गीकरण पर ध्यान देने की बहुत ज्यादा जरूरत है। इंसान ने मूर्खता बस इस सुंदर स्वर्ग को नर्क बना दिया है। जिसकों वह परिभाषित नही कर सकता और कहानियों में सुना है, को स्वर्ग मान लेता है। लेकिन जो प्रत्यक्ष है उसको खराब करने में लगा हुआ है। क्या आप साबित कर सकते हैं कि आप पहले से स्वर्ग में नही है ? बस एक सोच जिससे हम इतने पीछे हट गये हैं कि प्राकृतिक संसाधनों को लगातार नुकसान पहुंचा रहे हैं। भारत वर्षों उन्नति सिर्फ प्राकृतिक संसाधनों पर टिकी हुई है, इसको जितनी जल्दी समझ जाएं उतनी तरक्की होगी।