उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र प्राकृतिक वनस्पतियों के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। पहाड़ी क्षेत्र में बारिश के मौसम में जंगलों में मसरूम (चूं) और कुथल्ड जिसको उत्तर भारत में लिंगुड़ा के नाम से जाना जाता है, खूब उगते हैं। आज से कुछ साल पहले यह कुथल्ड कभी कभार ही उत्तराखंड के बाजारों में देखा जाता था लेकिन पहाड़ी क्षेत्र से पलायन के बाद अब उत्तराखंड के मैदानी बाजारों में इसकी भारी मांग है। यही वजह है कि आज कल कुथल्ड/लिंगुड़ा ₹80 प्रति किलो के हिसाब से बिक रहा है।

कुथल्ड/लिंगुड़ा की सब्जी कटहल की तरह स्वादिष्ट होती है। इसे बनाना बहुत आसान होता है। इसे बिलकुल उसी तरह छौंका जाता है जैसे हरी बीन्स।कुथल्ड/लिंगुड़ा स्वाद के साथ पौष्टिक तत्वों की भरमार है।कुथल्ड/लिंगुड़ा का  वानस्पतिक नाम डिप्लाजियम ऐस्कुलेंटम (Diplazium esculentum) है। यह भारत के अन्य हिस्सों में अलग-अलग नामों से पहचाना जाता है। असम में धेंकिर शाक, सिक्किम में निंगरु, हिमाचल में लिंगरी, बंगाली में पलोई साग और उत्तर भारत में लिंगुड़ा कहा जाता है।

यह प्रायः नमी वाले स्थानों पर उगते हैं। जब तक यह अपने तने के साथ मुड़े होते हैं उसी समय तक इसको शब्जी बनाने लायक उपयोगी माना जाता है। धीरे-धीरे ये चौड़े पत्ते का रूप लेने लगते है जिस अवस्था में इसको जहरीला मानकर छोड़ दिया जाता है। ठीक यही सिद्धान्त पहाड़ी जंगली मसरूम (चूं) का भी है। लेकिन स्थानीय लोग फट से पहचान लेते हैं कि कौन खाने लायक है और कौन नही।