उत्तराखंड में आज कल कोरोना की रोकथाम के लिए सरकार द्वारा घर-घर एक दवाई पहुंचाई जा रही है। लेकिन दवा वितरक महज खाना पूर्ति कर रहे हैं। राज्य में कोरोना की रोकथाम और लोगों के स्वास्थ्य को लेकर सरकार lveriv-12 नामक दवा का वितरण कर रही है। इसके तहत वितरक 06 गोली प्रति व्यक्ति के हिसाब से वितरण कर रहा है साथ ही आपका नाम और फोन नम्बर एक रजिस्टर पर दर्ज कर रहा है। 

शनिवार को दवा वितरण के लिए एक आदमी देहरादून बंजारावाला के हरि ओम क्षेत्र में आया। कालोनी में दाखिले के बाद उसने सिर्फ एक घर की घण्टी बजाई और कहा सरकार की तरफ से निःशुल्क दवा दी जा रही है। गृह स्वामी ने लेली। उसके बाद वितरण कर्ता ने कहा कोई रह तो नही गया और आगे चला गया जबकि कालोनी में कई घर थे। तो क्या इस प्रकार से सरकारी पैसे का दुरुपयोग नही हो रहा है ? या यह कार्य सरकार सिर्फ वाह वाही के कर रही है। 



इस दवा पर कोई मूल्य नही छपा हुआ है लेकिन उत्तराखंड सरकार द्वारा जारी व बेचे न जाने की हिदायत है। पहाड़ समीक्षा ने जब इसकी पड़ताल की तो इस दवा की बाजार में कीमत लगभग 23 से 24 रुपये प्रति 10 टैबलेट है। lveriv-12 टैबलेट एक्टोपैरासाइटिसाइड नामक दवाओं की एक श्रेणी से सम्बन्ध रखती है और इसका उपयोग आंतों (इंटेस्टाइनल ट्रैक्ट), त्वचा और आंखों के परजीवी संक्रमण के इलाज में किया जाता है। अर्थात इसका मतलब यह है कि यह बैलक फंगस की रोकथाम के लिए वितरित की जा रही है। लेकिन जो इस दवा का वितरण कर रहा था वह इसको कोरोना के लिए प्रतिरोधक बता रहा था।

सवाल यह है कि इस दवा पर जो पैसा सरकार ने खर्च किया वह जनता का पैसा हैं। जनता का मतलब है समाज के हर एक उस नागरिक का जो बाजार से कुछ भी खरीद करता है। क्योंकि भारत में वस्तु कर एक ऐसी व्यवस्था है जिसमे देश का हर वर्ग व हर नागरिक टैक्स भुगतान करता है। फिर अगर यह दवा कुछ को मिले और कुछ को नही तो यह सही नही है। जनता का पैसा अगर जनता के हित में समानता न काम करे तो शासन/शासक कैसा ? सरकार को इस विषय पर सज्ञान लेना चाहिए।