समाज मे सही समन्वय के लिए जरूरी है कि महेश नेगी जैसे प्रकरणों पर त्वरित कारवाई हो। प्रदेश सरकार को चुनाव से ज्यादा इस समय इस प्रकरण पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत।

जन प्रतिनिधि समाज का आईना होता है। ऐसे में एक जनप्रतिनिधि का चरित्र साफ होना बहुत अहम हो जाता है। विधायक महेश नेगी के खिलाफ एक महिला ने दुष्कर्म का आरोप लगाया था। इस मामले में पुलिस ने पीड़िता की ओर से मुकदमा दर्ज नहीं किया था। ऐसे में पीड़िता ने कोर्ट में शिकायत की। इसके बाद नेहरू कॉलोनी में विधायक महेश नेगी व उनकी पत्नी के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था। पीड़िता का आरोप है कि विधायक ने देश के कई शहरों में ले जाकर उसके साथ दुष्कर्म किया है। इससे उनकी एक बेटी भी पैदा हुई है। पीड़िता का दावा है कि उसने बेटी का डीएनए टेस्ट कराया था, जिसमें महेश नेगी ही उसके जैविक पिता होने की पुष्टि हुई थी।


उसके बाद से लगातार पुलिस कोर्ट के आदेश पर महेश नेगी का डीएनए करवाना चाहती थी लेकिन विधायक इससे बचते रहे। जिस महिला ने उन पर यह आरोप लगाया था कि उन्होंने उसका यौन शोषण किया, उसके बताए जगहों पर पुलिस ने जब पूछताछ की तो सभी बातें सच साबित हुई। मसूरी से लेकर दिल्ली के होटलों तक विधायक महिला के साथ थे। विधायक लगातार डीएनए जांच से बचते रहे और कोर्ट में याचिका दायर कर दी। मझेदार बात ये है कि कोर्ट ने भी याचिका पर अमल किया और फिलहाल के लिए रोक लगा दी। इसका मतलब साफ है कि वर्तमान भाजपा सरकार महेश नेगी को बचाना चाहती है।

नैनीताल हाईकोर्ट ने विधायक महेश नेगी को राहत देते हुए डीएनए सैम्पलिंग के लिए कोर्ट में पेशी के आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के बाद फिलहाल उस पर रोक लगा दी थी। कोर्ट ने सरकार व विपक्षियों को जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए थे। अगली सुनवाई 13 जनवरी 2021 को होनी थी लेकिन 13 जनवरी को हुई सुनवाई में एकलपीठ ने मामले में सुनवाई करने से इनकार कर दिया। सवाल यह है कि जब निचली अदालत डीएनए के लिए आदेश जारी कर चुकी है तो क्या हाई कोर्ट ऐसे लोगों की सुनवाई ही करता रहेगा जो समाज के लिए एक दूषित चरित्र से ज्यादा कुछ नही हैं। उससे भी बड़ी बात कि प्रदेश सरकार पूरे मामले पर चुप क्यों है ? क्या यही है महिला सशक्तिकरण का प्रदेश सरकार का नारा ?

महेश नेगी प्रकरण से यह तो साफ हो गया है कि अगर आपके पास पैसा और पॉवर है तो पुलिस भी आपके आगे बौनी है। एक ऐसा व्यक्ति जिसके पर लगे सभी आरोप प्रत्यक्ष साबित हो रहे हों, पर हाई कोर्ट बार बार सुनवाई करे तो कानून भी कमजोर नजर आता है। आम जनता में इसका सही सन्देश नही जाता है और सामाजिक अशांति को बढ़ावा मिलता है। प्रदेश सरकार को 2022 चुनाव से पहले इस प्रकरण पर ध्यान देना होगा, नही तो 2022 के चुनाव में भाजपा को नुकसान हो सकता है।