हर माह नेताओं पर खर्च होने वाले पैसे में अगर कटौती की जाय तो राज्य में 10,000 लोगों को रोजगार सम्भव। आखिर जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि को जनता के बीच मे असुरक्षा कैसी ?

उत्तराखंड राज्य में जब तक माननीय हाई कोर्ट कुछ न कहे तब तक सरकार सोई हुई रहती है। वेतन हो या फिर युवाओं को रोजगार, सब पर हाई कोर्ट को टिप्पणी करनी पड़ती है। इससे बड़ा सवाल यह है कि ऐसी विवेकहीन सरकार का जनता के लिए क्या लाभ ? चार माह से रोजवेज कर्मियों को वेतन नही देने पर माननीय कोर्ट को टिप्पणी करनी पड़ी तो अब सरकार हरकत में आ गई है। जनता द्वारा इतना टैक्स चुकाने के बाद भी राज्य में फंड की कमी दर्शाता है कि नेता राज्य को कितना खोखला कर चुके हैं। स्थिति ऐसी हो गई है कि आज कमाओं और आज खाओ।कोरोना के चलते उत्तराखंड परिवहन कुछ समय बन्द क्या रहा कि कर्मचारियों को देने के लिए वेतन ही नही है।  


आपको यह जानकर हैरानी होगी कि विकासशील देशों की मूलभूत सुविधाओं के लिए विकसित देश कुछ चैरिटी करतें है। इन सेवाओं में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं प्रमुख्यता से हैं। इस चैरिटी के साथ ही सरकारी महत्वपूर्ण सेवाओं में तैनात कर्मचारियों को कुछ अंशदान विकसित देशों का होता है। यह अंशदान विकसित देशों के लोग अपने वेतन से टैक्स चुका कर करते हैं और बदले में सरकार उनको बहुत सी रियायतें प्रदान करती है। विकसित देश इस पैसे को विकसशील देशों की दशा सुधारने पर बिना शर्त के खर्च करते हैं। भारत भी वर्षों से यह मदद पाता आया है। इसके आलवा देश का हर नागरिक वस्तु टैक्स चुका रहा है। केंद्र सरकार विश्व बैंक से अरबों का लोन भी ले रही है। तो पैसा जा कहाँ रहा है ?

जनता को यह खेल समझना होगा। एक जनप्रति आज अपनी सुविधाओं पर बहुत अधिक खर्चा कर रहा है। जिसका खमियाजा आम जनता को उठाना पड़ रहा है। नेताओं को मिलने वाले हर तरह के भत्ते पूर्ण रूप गलत हैं। जिसमें ₹1500 मोबाइलबिल खर्चा/माह और पेट्रोल डीजल जैसे भत्ते बाबजूद की साल भर में कई यात्राएं निःशुल्क मिलती है, को बन्द करना होगा। आज हर मुख्यमंत्री हैलीकॉप्टर रखे हुए है और कुछ के पास तो विमान भी हैं। सवाल यह है कि इनके पास ऐसी कौनसी नौकरी थी कि इन्होंने हैलीकॉप्टर या विमान खरीद लिया? सामाजिक असंतुलन पैदा करने के बाद संतुलन बनाने का वादा करने वाले लोगों को समझना होगा कि आपकी जिम्मेदारी केवल जनहित है। इसलिए आपको जनता ने चुना भी है।

इस देश का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि 30 से 35 साल नौकरी करने वाले कर्मचारी को पेंशन योजना से बाहर कर दिया गया और महज पाँच वर्ष के लिए जनता द्वारा चुने जाने पर आजीवन पेंशन मिल जाती है। पांच साल रहने के लिए आवास और अनके भत्ते मिल जाते हैं। जिस पैसे से रोजगार पैदा होना था उसको जनप्रतिनिधियों की शानोशौकत में खर्च कर दिया जाता है और दर्जनों पद खाली होने के बाद भी युवाओं को रोजगार नही दिया जाता। क्या इस तरह से बनेगा सामाजिक संतुलन ? शायद कभी नही।

सरकारों को चाहिए था कि जनसंख्या के नियंत्रण पर काम करें और यह सुनिश्चित करें कि नेताओं/जनप्रतिनिधियों द्वारा की जा रही बेफिजूल खर्ची में कटौती कर हर घर को कैसे रोजगार दिया जा सके। सरकारी स्कूली शिक्षा को कैसे बेहतर किया जाय, स्वास्थ्य के क्षेत्र में कैसे क्रांति पैदा की जाय। सरकारें यह बात माने चाहे नही माने कि भ्रष्टाचार के बढ़ने से पैसे की जमाखोरी बढ़ी है। भले पैसा पैसे के रूप में कम और प्रोपर्टी इत्यादि के रूप में अधिक संचय हो गया हो  या दूसरे देशों में किसी रूप संचित हो गया हो, ने रोजगार पर बहुत गहरा असर डाला है।

यही वजह है कि सरकारी परीक्षाओं में भाग लेने वाले परीक्षार्थी सफलता के बाद भी दो से तीन साल घर पर ही बैठे रह जाते हैं। क्योंकि सरकार के पास विभाग को देने के लिए पैसों का अभाव है। जानते हैं क्यों ? क्योंकि महज 71 विधानसभा सदस्यता वाले इन 71 लोगों के शानोशौकत पर इतना खर्चा है कि कम से कम 10000 या उससे अधिक युवाओं को रोजगार दिया जा सकता है। जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधि को जनता के बीच आने के लिए सुरक्षबलों की जरूरत पड़े तो समझ जाइये भारत किस दिशा में बढ़ रहा है। क्योंकि किसी भी विकसित देश में जनप्रतिनिधियों के ऊपर इतना खर्चा नही होता जिस वजह से उनका पैसा व ऊर्जा सकारात्मक दिशा में कार्य करतें है।