उत्तराखंड में 20 जून के बाद मानसून सक्रिय होने के आसार हैं।ऐसे में पहाड़ी क्षेत्रों की सुरक्षा एक बड़ी चुनौती है। लोगों को अपने से सतर्कता बर्तनी होगी। 

पहाड़ों पर उचित व्यवस्था के अभाव में लोगों को ऋषिकेश या देहरादून तक पहुंच बनाई रखनी पड़ती है। सड़क माध्यम के अलाव कोई और विकल्प न होने के कारण पहाड़ी क्षेत्र की टूटीफूटी सड़कें ही यहां के लोगों की लाइफ लाइन है। लेकिन प्री मानसून और मानसून में इन मार्गों को हर साल क्षति पहुंचती है। नतीजा ये होता है कि अधिकांश ऐसे गांव जहां सड़के नहीं है और मिलों चलने के बाद उनकी पहुंच इस सड़को तक है, के लिए जीने और मरने का सवाल है। 

वर्ष 2016 से चल रहा कथित ऑल वेदर (चारधाम यात्रा मार्ग) कार्य भी अभी पूरा नही हुआ है। इस मार्ग ने अभी तक बरसात झेली भी नही है। खड़ी कटाई इस प्रोजेक्ट को कई बार कठघरे में ला चुकी है लेकिन इसका किसी पर कोई असर नही पड़ा। लिहाजा यह सुनिश्चित करना स्थानीय लोगों का ही काम बन जाता है कि वे सुरक्षित स्थानों पर जाकर रहें क्योंकि खड़ी कटाई वाले हिस्से आज नही तो कभी न कभी नीचे आएंगे ही और उस स्थिति में कितना नुकसान होगा इसका सरकारों के पास कोई आंकलन नही है।

पहाड़ी क्षेत्र वाहन संचालन के लिहाज से काफी संवेदनशील माने जाते हैं। क्योंकि आपको नही पता कि आगे कितनी दूरी तक आपका सफर सुरक्षित रहेगा। मोड़ो का अधिक घुमाव और खड़ी चट्टनों के बीच आप सिर्फ कुछ ही मीटर का मर्ग सही से देख पातें हैं। लिहाजा बारिश ऐसे रास्तों पर अधिक मुसीबत बनकर आती है। अधिक बारिश से चट्टानों के ऊपरी हिस्से में मिट्टी का द्रव्यमान बढ़ जाता है और धीरे धीरे पकड़ भार के कारण हिस्सों में बंट जाती है। जिससे पहाड़ी अलग अलग जगह से मिट्टी को छोड़ देती है और रास्ते व सड़कों पर आ गिरती है।

उत्तराखंड में प्री मानसून की बारिश ने ही बहुत जगहों पर हालात नाजुक बना दिए हैं। जबकि अभी मानसून राज्य में लौटा भी नही है। बागेश्वर में कई सड़कें बाधित हैं। उधर पिथौरागढ़ मार्ग भी पिछले 55 घण्टों से बाधित चल रहा है। यात्री रास्तों पर फंसे हुए हैं और मौसम अभी भी खराब है। मानसून से पहले ही पहाड़ी क्षेत्र की सड़कें जगह जगह से टूटने लगती हैं और यातायात पूरी तरह से प्रभावित हो जाता है। यातायात का सुचारू रहना बहुत कारणों से जरूरी होता है लेकिन एक सबसे प्रमुख कारण है स्वास्थ्य सेवाएं।