उत्तराखंड में 20 जून के बाद मानसून के सक्रिय होने का पूर्वानुमान मौसम विभाग दे चुका है। पहाड़ों में भूस्खलन और बादल फटने की घटनाएं इस सीजन में सबसे अधिक होती हैं। आपको बता दें कि हर साल सैकड़ो गाँव इस मौसम में आपदा के शिकार हो जाते हैं। सरकार कुछ दिन तक तो खूब ढोल बजाती है लेकिन उसके बाद सब ठंडे बस्ते में चला जाता है। वर्ष 2011 में आपदा पुनर्वास नीति बनाई गई, ताकि प्रभावित गांवों का जल्द किसी दूसरी जगह विस्थापित किया जा सके। इस बाबत एक सर्वे भी हुआ जिसमें राज्य के पहाड़ी क्षेत्र में 421 गांवों को चिन्हित किया गया लेकिन लगभग 10 वर्ष की समयावधि में जो पुनर्वास रपट सामने आई है, हैरान करने वाली है।

अपनी भौगोलिक परिस्थियों के कारण उत्तर प्रदेश से पृथक हुआ उत्तराखंड 20 वर्ष बाद भी उन्ही भौगोलिक परिस्थितियों से नही निपट पाया है। सुविधाओं की तो बात ही क्या करें। पहाड़ी क्षेत्र के अधिकांश गाँव आज भी जिला मुख्यालय से कोषों दूर अलग-थलग अर्थात बिना किसी सड़क और यातायात सुविधा के बसे हुए हैं। मानसून में आपदा के कारणों में राहत व बचाव कार्य के लिए जब तक स्थानीय प्रशासन जागता भी है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। वर्ष 2011 में तत्कालीन सरकार की नींद खुली तो पुनर्वास योजना का ख्याल आया लेकिन आज 2021 है और इस योजना में अब तक महज 43 गांव ही पुनर्वास कर पाए हैं जबकि पूर्व सर्वे में ही गांवों की संख्या 421 बताई गई है।

अब इस पुनर्वास को सरकार लगभग डंप करने की कोशिश में लगी हुई है। क्योंकि वर्ष 2016 में हैली एम्बुलेंस सेवा की मांग के बाद से यह मान लिया गया कि ऐसे दुर्गम क्षेत्र जहां सड़क से जिला मुख्यालय को जोड़ना पर भी राज्य सरकार खर्चा नही करना चाहती, को हैली एम्बुलेंस एक मजबूत विकल्प नजर आता है। दुर्भाग्य की बात है कि एक नेता इस देश में 15 करोड़ में बिक या खरीदा जा सकता है लेकिन एक पूरा गांव जो कि हर घड़ी मुसीबतों का सामना कर रहा है, का पुनर्वास नही हो सकता या उस तक सड़क नही पहुंचाई जा सकती है।