ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल मार्ग के चलते पहाड़ी क्षेत्र में दिक्कत शुरू, टनल निर्माण से हो रहे कम्पन से घरों में पड़ रही हैं दरारें। लोगों को प्रशासन है उम्मीद कि गाँव की सुरक्षा को प्राथमिकता मिले।

उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों को रेल मार्ग से जोड़ने के साथ साथ केंद्र सरकार ने सभी चार धामों को जोड़ने के लिए पहाड़ी क्षेत्रों का सर्वेक्षण करवाया। इस सर्वेक्षण के अनुसार रेल मार्ग का 80 से 90% कार्य भूमिगत रूप से सम्पन्न किया जाना है। इसलिए अधिकांश पहाड़ी क्षेत्र के नीचे या निकट से भूमिगत सुरंगों का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है। लेकिन अब कुछ पहाड़ी क्षेत्रों से रपट आ रही है कि सुरंग के निर्माण कार्य में होने वाले विस्फोट से मकानों में दरारें आ रही हैं। रेल मार्ग का अधिक दूरी तक भूमिगत होना अपने आप में ज्यादा सुरक्षित वैसे भी नही है। क्योंकि उत्तराखंड एक उच्च भूकम्पीय क्षेत्र है इसलिए भूमिगत रेल मार्ग अपने आप में बहुत सुरक्षित साबित नही होने वाला है क्योंकि अधिक दूरी पहाड़ो की स्थिरता को कहीं न कहीं कमजोर कर रही हैं।  

आल वेदर के नाम पर पहले ही पहाड़ी क्षेत्र में भूमि का अधिक कटाव हो चुका है। बद्रीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग के समीप बसने वाले दर्जनों ऐसे गांव जिनकी दूरी राजमार्ग से ज्यादा नहीं है और राजमार्ग के ऊपर या नीचे बसे हुए है, सुरक्षित नही हैं। रुद्रप्रयाग से ऐसी ही एक रपट प्रकाश में आई है। नरकोटा गांव के ग्रामीणों का कहना है कि रेल लाइन निर्माण व ऑलवेदर रोड परियोजना के मलबे से नर्वदेश्वर मंदिर को भारी क्षति पहुंची है। जिलाधिकारी के अनुसार क्षेत्र में दोनों परियोजनाओं के कारण हुई क्षति का आंकलन किया जा रहा है और जल्द मुआवजा तय किया जाएगा।

सवाल ये है कि क्या प्राकृतिक संसाधनों/प्रकृति की बनावट से छेड़छाड़ के बाद मुआवजा ही सब कुछ है ? क्या हम विकास के नाम पर पहाड़ी क्षेत्र में रहने वाले लोगों की जिंदगी खतरे में नहीं डाल रहे हैं ? अर्थव्यवस्था के लिहाज से यह उन लोगों के लिए तो सही है जिन्होंने इन मार्गों से कभी कबार गुजरना है, लेकिन जिसकों 24x7 और 365 दिन यहीं पर रहना है उनके लिए तो हमने एक ऐसा जाल बना दिया है कि अगर कभी कोई अनहोनी हुई तो बचने का कोई सवाल ही बाकी नही रहेगा। सड़कों से ऊपरी मिट्टी को पकड़ खराब व वनस्पति को भारी नुकसान, सुरंगों से पहाड़ो की स्थिरता को नुकसान और बांधों (डैम) से प्रकृति व नदियों के जल स्तर को नुकसान के साथ इंसान जिस तरह के सपने सजा रहा है, परिणाम बेहद चिंता जनक होंगे।

सड़क निर्माण में होने वाले बिस्फोट से अगर मकानों में दरारें आ रही हैं तो ये समझना जरूरी है कि इसका समाधान मुआवजा नही है। सरकार को ये समझना होगा कि इंसान को विकास के नाम पर एक व्यवस्थित जीवन देना होगा। सरकार के लिए यह काम बहुत मुश्किल भी नही है। शहरों में भूमि आवंटन से अच्छा है कि एक व्यवस्थित छोटी सिटी का निर्माण किया जाय। जहाँ पर जीवन जीने के लिए आधारभूत सुविधाओं का संग्रह किया जाय। ऐसे स्थानों को चयन करने में सरकार को बहुत माथापच्ची करने की भी जरूरत नहीं है। लगभग हर पहाड़ी जिले के पास ऐसे दर्जनों क्षेत्र खाली पड़े हुए हैं जिनको सही मानकों के साथ विकसित किया जा सकता है।  

सुविधाओं के वर्गीकरण को आज हर किसी को समझना होगा। आज हम किसी भी योजना के सिर्फ एक पहलू लेकर आगे बढ़ रहे हैं और वह है पैसा। सरकार अपनी कमाई देख रही है और स्थानीय लोग कुछ मुआवजे के रूप में तो कुछ पर्यटन के रूप में। आज विभिन्न परियोजनाओं के दूसरे ऐसे कारणों को भुला दिया गया है जो मानव जाति के लिए विनाशकारी है। जिस राज्य का लगभग 65% भूभाग पहाड़ी हो और उसके विकास पर उचित ध्यान नहीं दिया गया हो तो बाकी का 35% भूभाग स्वतः ही विभिन्न कारणों से असुरक्षित है।