21.186 हैक्टेयर भूमि पूर्व से ही सरीन बंधुओं के नाम है। एसडीएम कर्णप्रयाग वैभव गुप्ता ने बताया कि जिस जगह को फ़ोटो और वीडियो के माध्यम से वायरल किया जा रहा है वह जमीन राजीव सरीन के नाम पर ही रजिस्टर है।

 

सबसे पहले इस क्षेत्र के बारे में जान लीजिए। गढ़वाल मण्डल के हिमालय क्षेत्र तलहटी में जहां पेड़ों की पंक्ति (timber line) समाप्त होती है उसके ठीक बाद हरे भरे मैदान आरम्भ हो जाते हैं। ये हरे रंग की घास ही बुग्याल है। जिसके नाम पर इन क्षेत्र का नाम पड़ा हुआ है। बुग्याल, हिम रेखा और वृक्ष रेखा के बीच का क्षेत्र है। यह क्षेत्र 08 से 10 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है। स्थानीय लोग इस क्षेत्र को वर्षों से मवेशियों के चारागाह के रूप में उपयोग करते आए हैं। अब क्योंकि यह क्षेत्र प्राकृतिक रूप से बेहद खूबसूरत है इसलिए घुमन्तुओं और ट्रैकिंग के शौकीनों के लिए आराम की जगह के रूप में सुमार है। यहां तक जाने के लिए एक कच्चा रास्ता बनाया गया है। अब यह क्षेत्र अचानक विवादों में आ गया है क्योंकि किसी ने इसको निजी सम्पत्ति होने का दावा किया है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, बेनीताल बुग्याल की भूमि पर आजादी से पहले टी स्टेट हुआ करती थी। कुछ रिकॉर्ड बताते हैं कि इस भूमि पर 1960 से पहले ही गंगा राम सरीन नाम के व्यक्ति का कब्जा था। सरकारी कागजों में इस वक्त पर भूमि राजस्व रिकॉर्ड में भी गंगाराम सरीन के नाम दर्ज थी। गंगा राम सरीन के बाद यह भूमि उनके परिजन प्रेम नाथ सरीन के नाम हस्तांतरित हुई। इसके बाद इसमें राजीव सरीन व अन्य लोगों के नाम दर्ज हुए। उसके बाद से ही बेनिताल बुग्याल की भूमि  भू-स्वामित्व विवाद में आई और उस वक्त यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में चला क्योंकि राज्य उत्तर प्रदेश था, फिर नैनीताल हाईकोर्ट में चला  और अंत में  सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया।

2015 में सुप्रीम कोर्ट में भूमि विवाद पर निर्णय आने के बाद 697.484 हेक्टेयर भूमि उत्तराखण्ड सरकार के नाम दर्ज हुई। जबकि सरीन बन्धुओं को मुआवजे के रूप में धनराशि के साथ 21.186 हेक्टेयर भूमि राजीव सरीन,अजीत सरीन, आदित्य सरीन के नाम दर्ज करवाई गई। सरीन बंधुओं का इस भूमि पर वर्तमान समय मे तालाब, बुग्याल व भवन मौजूद हैं। सरीन बंधुओं द्वारा अपनी चिह्नित भूमि पर ही निजी संपति का बोर्ड भी लगाया गया। आज लगभग 05 वर्ष बाद यह मुद्दा फिर से गरमा गया है। बताया जा रहा है कि 1600 हेक्टेयर भूमि पर बाहरी लोग अवैध रूप से कब्जा करना चाहते हैं। 

यह मुद्दा इस लिए गरमा गया है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय सीमा रेखा से बाहर राजीव सरीन ने अपनी निजी सम्पत्ति का बोर्ड लगा दिया है। क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि उनके वंश ज्ञान के अनुसार उनके परदादा और उनके पूर्वजों ने भी वहां गाय-बकरियां चूँगाई हैं। ऐसे में सवाल यह खड़ा हो रहा है कि यह सम्पत्ति सरीन जाति के लोगों के नाम कैसे दर्ज हुई। अब इसमें दो अहम पहलू जुड़ गए हैं। क्योंकि किसी भूमि पर लम्बे समय तक कब्जे की स्थिति में स्वामित्व का प्रावधान भारतीय कानून में पहले से था, इसलिए हो सकता है कि 1960 में जिस गंगा राम सरीन के नाम का जिक्र है, के नाम यह भूमि इसी आधार पर दर्ज हुई हो। दूसरा पहलू ये है कि जब वर्ष 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने सरीन बंधुओ को 21.186 हैक्टेयर भूमि पर स्वामित्व दे दिया था तो फिर अतरिक्त भूमि पर निजी सम्पत्ति का बोर्ड लगाने का क्या मतलब ?

अब क्योंकि कानून कागजों को शाक्षी मानता है इसलिए यह बात तो साफ है कि जितनी भूमि सरीन बंधुओं को आवंटित है वह उनके पास ही रहेगी। लेकिन अतिरिक्त भूमि पर सरीन बंधु मालिकान हक बिना कानूनी लड़ाई के नही मांग सकतें है। इस मामले की जब पहाड़ समीक्षा ने जांच पड़ताल कि तो एसडीएम कर्णप्रयाग वैभव गुप्ता ने जानकारी मिली कि वायरल हो रही फोटो और वीडियो की सच्चाई जानने के लिए राजस्व उपनिरीक्षक कोटी देवेन्द्र कंडारी के नेतृत्व में टीम मौके पर भेजी गई। जो भूमि विवादस्पद बताई जा रही है वह भूमि राजस्व रिकॉर्ड में राजीव सरीन बंधु के नाम पर ही है। सरकारी भूमि पर कोई भी निजी बोर्ड या तारबाड़ नहीं की गई है। अब राजनीतिक पार्टियां इस विषय को किस प्रकार से पेश कर रही हैं, इसका आधार क्या है? सवाल यह भी है कि अगर किसी राजनीतिक पार्टी के पास इस जमीन के सरीन बंधु के नाम होने को लेकर कोई ऐसा साक्ष्य है जो गलत हो, तो फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती क्यों नही दी गई?

भारतीय कानून प्रत्यक्ष साक्ष्य की सत्यता पर आधारित है। क्योंकि सरीन बंधुओं के पास उनके पूर्वजों द्वारा कब्जे के बाद जमीन का दाखिला-खारिज मौजूद रहा होगा, जिस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें मुआवजे के साथ 21.186 हैक्टेयर भूमि भी दी। इस बात को नकारा नही जा सकता कि सरीन बन्धु लालच बस अतिरिक्त जमीन पर कब्जा करने कि कोशिश कर रहे होंगे लेकिन 21.186 हैक्टेयर भूमि को छोड़कर सारी भूमि वन विभाग के अधिकार क्षेत्र में है। ऐसे में बिना सरकार की मिलीभगत के भूमि का हस्तांतरण होना असम्भव है। अब 2022 विधानसभा से पहले यह मुद्दा गरमाया है तो इनके पीछे राजनीतिक कारण भी हो सकते हैं। जिला प्रशासन भी अगर भूमि पर कब्जे की बात को नकार रहा है तो इसका मतलब साफ है कि इस मामले को अफवाह बनाकर दिखाया गया है।