जाति कार्ड का उपयोग कर कांग्रेस ने बढाई भाजपा की मुश्किलें।चुनाव के पास आते ही जातियों के आधार पर राजनीतिक चेहरों पर शुरू हो जाता है विचार।

उत्तराखंड में 2022 की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं, लिहाजा सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्य विपक्ष कांग्रेस, दोनों अपनी तैयारी में कोई कसर नहीं छोडऩा चाहते हैं। दोनों ही दल गढ़वाल व कुमाऊं मंडल के बीच क्षेत्रीय संतुलन साधने के लिए नेता विधायक दल एक मंडल से बनाते हैं और संगठन का मुखिया दूसरे मंडल से। यही फार्मूला ब्राह्मण व राजपूत वर्ग के मध्य जातीय संतुलन के लिए भी अपनाया जाता है। भाजपा नेतृत्व ने गत मार्च में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के साथ ही प्रदेश अध्यक्ष बंशीधर भगत को बदल कर सबको चौंका दिया था। 


अब प्रदेश कांग्रेस ने जो दांव खेला उससे प्रदेश भाजपा भी परेशान नजर आ रही है। पांच साल बाद सत्ता में वापसी की कोशिशों में जुटी कांग्रेस ने प्रदेश संगठन की कमान गणेश गोदियाल को सौंप कर जो पैंतरा चला, उसने भाजपा के क्षेत्रीय व जातीय संतुलन के समीकरणों को गड़बड़ा दिया है। राजनीतिक गणितज्ञों का मानना है कि कांग्रेस ने ब्राह्मण वोट बैंक की अहमियत को देखते हुए यह कदम उठाया, जो अब भाजपा के लिए असमंजस की वजह बनता दिख रहा है। 

इधर पुष्कर धामी के मुख्यमंत्री बनने से कांग्रेस के समीकरण भी हिले हुए हैं। राजनीतिक गणितज्ञों का मानना है कि मूल रूप से पिथौरागढ़ के पुष्कर सिंह धामी राजपूत हैं और ऊधम सिंह नगर जिले की खटीमा सीट से विधायक हैं। यानी, धामी के रूप में कुमाऊं मंडल और तराई, दोनों को प्रतिनिधित्व देकर भाजपा ने कांग्रेस, खास तौर पर हरीश रावत के लिए तगड़ी चुनौती पेश कर दी। हालांकि पुष्कर धामी के राजनीतिक तजुर्बे को देखते हुए कांग्रेस इस बात को नकार रही है लेकिन राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि अगर हरीश रावत ऐसे गलती करतें है तो पार्टी को नुकसान होगा।