आज बिन स्वारत नही है प्रीति, हर बात में राजनीतिक खेल खेल जाती है सरकार। आम जनता बस नारे लगाती रह जाती है। जब तक खेल समझ आता है वक्त निकल जाता है।

चुनाव के पास आते ही विज्ञप्तियों का आना कोई युवाओं को रोजगार देने का विचार नही है। दरअसल, चुनाव के पास आते ही सरकार को पार्टी के प्रचार प्रसार के लिए फंड जुटाना एक बहुत बड़ी चुनौती बन जाता है। इसलिए चुनाव के पास आते ही एक तो विभिन्न सरकारी विभागों को चालान के निर्देश जारी कर दिए जाते हैं दूसरा लगातार स्नातक और 12वीं स्तर के लिए विज्ञप्तियां निकाली जाती है, जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग फॉर्म भरें और सरकार के पास पैसा पहुंचे। सोचिए जो सरकार चार में चार बार विज्ञप्तियां नही निकाल पाई, वह एक माह में तीन तीन विज्ञप्तियां जारी कर रही है।


दूसरा बड़ा सवाल यह है कि राज्य में 2016 के बाद से पीसीएस के कोई विज्ञप्ति जारी नही की गई और अब चुनावी माहौल में भी नही की जा रही। क्योंकि सरकार जानती है पीसीएस के लिए आवेदक इतनी बड़ी संख्या में नही मिल सकते हैं कि चुनाव के लिए फंड जोड़ा जा सके। आज सब कुछ का पैमाना सत्ता है। किसी सत्ताधारी पार्टी को इससे फर्क नहीं पड़ने वाला की आपको रोजगार मिला या नही, अगर वह पहले से ही संवेदनहीन हो।

राज्य में पॉलीटेक्निक कॉलेजों में शिक्षकों का इतना अभाव है कि भाड़े के शिक्षकों से काम चलाया जा रहा है। यही हाल आईटीआई संस्थानों का भी है। लेकिन सरकार इन सब पर चुप है क्योंकि वह जानती है कि जनता कि कौनसी नस दबानी है और कौनसी नही। इसलिए हर विभाग में रिक्त पदों के बाबजूद केवल कुछ ही विभागों का चयन किया  जाता है। जहां पर परीक्षा देर सबेर करवाई जा सकती हो, नियुक्ति के लिए तीन-चार साल लटकाया जा सकता हो इत्यादि।

आम जनता सिर्फ इसका एक ही पहलू समझ पाती है कि सत्ताधारी पार्टी वोट खींचने के लिए ऐसा कर रही है। लेकिन इसके कई अन्य लाभ जो सत्ताधारी दल उठाते हैं, आम जनता की समझ से बाहर ही रह जाते हैं। वह मतदान भले ही विपक्ष को कर ले लेकिन नौकरी की चाह में डोनेशन सत्ताधारी दल को ही देना पड़ता है। बड़ी मुश्किल से हरीश रावत ने परीक्षा फॉर्म को निःशुल्क  किया था लेकिन सत्तापलट होते ही फिर से वही हाल हो गया। एक बार अगर इस तरह की व्यवस्था बन जाए कि सरकारी परीक्षाओं पर फॉर्म शुल्क नही देना होगा तो उम्मीद है विज्ञप्तियां समय पर निकलें और युवाओं को रोजगार मिले।