वृक्षारोपण सिर्फ फोटो खिंचवाने का जरिया बनकर सस्ती लोकप्रियता का जरिया बन रहा है। हर साल लाखों वृक्ष रोपाई के बाद भी धरातल पर हाजर वृक्ष भी मौजूद नहीं ।

उत्तराखंड में आए साल लाखों वृक्ष लगाए जातें है लेकिन अगले साल हरेला पर्व तक अधिकांश जगहों पर पेड़ का सूखा तना भी नही मिलता। वजह ? आज हमारा ध्यान लगाए गये पेड़ की सुरक्षा से ज्यादा सेल्फी को लेकर है। इसलिए हर साल श्रावण मास में एक पौधा रोपकर सेल्फी खींचकर हम अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेते हैं। श्रावण मास में मनाये जाने वाला हरेला सामाजिक रूप से अपना विशेष महत्व रखता तथा समूचे कुमाऊँ में अति महत्वपूर्ण त्यौहारों में से एक माना जाता है।


आज पहाड़ी जंगलों की क्या स्थिति है इस पर पहाड़ समीक्षा कई लेख प्रकाशित कर चुका है। जंगलों के नाम पर सिर्फ हमारे पास चीड़ के पौधे हैं। पिछले एक दशक में उत्तराखंड के जंगलों की क्या स्थित है, इस पर पहाड़ समीक्षा ने एक विस्तृत लेख लिखा था। अगर आप पढ़ना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें । आए साल लाखों वृक्ष लगाने के बाद भी अगर हम हाजर वृक्षों को नही बचा पा रहे हैं तो साफ है कि आज हम इसको सिर्फ सेल्फी उत्सव के रूप में मना रहे हैं। आज जबकि संसाधनों का अभाव नही है, हम पृथ्वी के आभूषण छीनते जा रहे हैं। इसमें वृक्ष, बर्फ और प्राकृतिक पानी के स्त्रोत मुख्य रूप से शामिल हैं।

लगातर हो रहा जलवायु परिवर्तन बता रहा है कि पर्यावरण एक गम्भीर विषय बन गया है। लेकिन हम अभी भी पर्यावरण को बचाने के लिए व्यवस्थाओं का उचित वर्गीकरण नही कर पाए हैं। हमारे पास त्वरित संचार प्रणाली सिर्फ भ्रम फैलाने के रूप में कार्य कर रही है। जिन विषयों पर त्वरित संचार से कारवाई की जरूरत है, बदकिस्मती से उस तरफ न जिला शासन का ध्यान है, न राज्य शासन का और न केंद्र शासन का। आज अधिकांश प्रदेशों के पास पर्याप्त जंगल भूमि भी संरक्षित नहीं है। कृषि योग्य भूमि भी निरन्तर कम हो रही है। जलवायु में ऐसा परिवर्तन देखने को मिला रहा है गर्म जगह वाले फल भी उन स्थानों पर पैदा होने लगे हैं जहां एक दशक पहले बर्फ हुआ करती थी।

इस स्थिति में पहुंचने के बाद भी एक वृक्ष एक सेल्फी से ज्यादा नजर नही आता तो मतलब साफ है। हम लोक पर्वों को उनकी सही भूमिका में लाना होगा। यह समझाना होगी कि इन पर्वों की अहमियत क्या थी जो आज सिर्फ सेल्फी बनकर रह गई। या कुछ अन्य पर्व जैसे दीपावली में प्रदूषण का कारक बनकर रह गई। मानव शरीर पांच चीजों से मिलकर बना है और बदकिस्मती से सभी प्राकृतिक स्त्रोत हैं। पानी 72%, मिट्टी 12%, हवा 6%, आग 4% और आकाश 6%, इन्हीं पाँच चीजों के संतुलन पर मानव शरीर टिका हुआ है। आज वर्तमान में जनसँख्या के हिसाब से अधिकांश कारक मानक से हिल चुके हैं। इसलिए जरूरी है कि मानव जाति कल्याण के लिए इस ओर ध्यान केंद्रित किया जाए।