2018 में वर्तमान भाजपा सरकार ने की थी भू-कानून से छेड़छाड़, 2022 में उत्तराखंड की जनता करेगी हिसाब बराबर अगर भू-कानून में नही किया सुधार।

प्रदेश में कुछ समय से भू-कानून मांग को लेकर अंदर ही अंदर धीमी लेकिन जला देने वाली आग सुलग रही है। पहाड़ी क्षेत्र पर दूसरे राज्यों से आए लोगों की अराजकता के बाद लोग समझने लगे हैं कि यदि ऐसा ही चलता रहा तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य खतरे से भरा होगा। इसलिए उत्तराखंड भी हिमांचल प्रदेश जैसा सशक्त भू-कानून मांग रहा है। प्रदेश में हाल ही में नेतृत्व परिवर्तन हुआ है और 2022 में विधानसभा चुनाव भी है, इसलिए इस समय यह एक बड़ा मुद्दा बन सकता है। अगर राज्य पार्टी उक्रान्त की बात करें तो वह इस मुद्दे पर लोगों के बीच पहुंचने भी लगी है। उक्रान्त अध्यक्ष दिवाकर भट्ट का कहना है कि अगर उक्रान्त सत्ता में आती है तो भू-कानून को पूरे प्रदेश में लागू किया जाएगा। उत्तराखंड बनने के बाद राज्य में उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि सुधार अधिनियम 1950 लागू किया गया। इसके बाद यहां इस कानून में समय-समय पर संशोधन हुए। उत्तराखंड में वर्ष 2002 में बाहरी व्यक्तियों के लिए भूमि खरीद की सीमा 500 वर्ग मीटर की गई। वर्ष 2007 में यह सीमा 250 वर्ग मीटर कर दी गई। लेकिन इसके बाद वर्ष 2018 में उत्तराखंड विधानसभा के शीतकालीन सत्र उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि सुधार अधिनियम,1950 में संशोधन का विधेयक पारित करवाया गया। इस संशोधन में भूमि की खरीद के लिए सभी मानकों को हटा दिया गया। जिसके बाद बाहरी राज्य का व्यक्ति कितनी भी जमीन खरीद सकता है। यह गन्द प्रदेश भाजपा सरकार ने ही मचाया और इसके बाद शहस्त्रधार में अमित शाह के बेटे को जमीन भी बेची गई। वर्ष 2022 में भाजपा की कई गलत नीतियों का आँकल कर ही जनता वोट देगी, इसलिए उम्मीद है कि भाजपा इस गलती में सुधार करेगी।


क्यों बढ़ रही है भू-कानून की मांग ? दरअसल, उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियों के कारण पहाड़ी क्षेत्र अपने शांत वातावरण के लिए जाने जाते हैं। लेकिन दूसरे राज्यो के अनेक शहरों में परेशान लोग या ऐसे लोग जिनके पास रहने के लिए शहरों में जगह नही है, उत्तराखंड पहाड़ी क्षेत्र की तरफ आ रहे हैं। कुछ लोग सीधे जमीन खरीद रहें है तो कुछ किराए के मकानों पर आकर पहाड़ी क्षेत्र में अशांति पैदा कर रहें है। यहाँ तक कि बाहर से आना वाला पर्यटक भी पहाड़ी क्षेत्र में दारू पीकर हुड़दंग मचा रहें है। पहाड़ी क्षेत्र में आने वाले लोगों में अधिकांश आवादी बिहार और उत्तर प्रदेश के मुसलमानों की है। ये लोग यहां ठेकेदारों के अंतर्गत विभिन्न कार्यों के लिए आते हैं और फिर धीरे धीरे यहीं बस जाते हैं। कई बार इन्हीं कार्य शरणार्थी लोगों ने पहाड़ी क्षेत्र से लड़कियों/औरतों को अपने साथ भगाने के प्रयास भी किए हैं। 

राज्य में लगातर बढ़ रहे अपराध के पीछे भी यही लोग प्रमुख्यता से पाए जा रहे हैं। इसके अलावा नेपाल से भी लोग बड़ी संख्या में आकर उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में बस गये हैं। उत्तराखंड को ऐसा समझ लिया गया है जैसे यह प्रदेश कोई धर्मशाला हो। कुछ वर्षों से देखा जा रहा है दूसरे राज्यो के अपराध प्रवृति के लोगों के लिए उत्तराखंड छिपने का अड्डा बन गया है। बहुत से यौन अपराध मामलों में पाया गया है दूसरे राज्यों से यहां लेबर बनकर आये लोग पहाड़ों पर कार्य कर रहे होते हैं। इनमें से कुछ इसलिए फंस जाते हैं क्योंकि यहां आकर वह पुनः उसी प्रवृति का काम करने लगते हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी है जो अपने राज्यों में अपराध प्रवृति का काम करते हैं और उसके बाद यहां आकर चुपचाप ठेकेदारों के साथ काम करते रहते हैं और धीरे धीरे पहाड़ी क्षेत्र में बस जाते हैं। 

क्या है मांग और हिमांचल किस तरह से अपनी भूमि की रक्षा करता है ? हिमांचल प्रदेश 09 वर्षों तक केंद्र शासित रहा है। हिमांचल प्रदेश में आज रोजगार के लिए निजी क्षेत्र की कम्पनियों की भी कमी नही है। सोचिए एक ऐसा प्रदेश जिसके यहां आप स्थाई रूप से मालिकाना हक नही ले सकते उसके पास रोजगार देने के कई बड़ी निजी क्षेत्र की कम्पनियां काम कर रही हैं और उत्तराखंड में कम्पनियों का इतना अभाव है कि युवाओं को रोजगार के लिए दूसरे राज्यों की तरफ भागना पड़ता है। पिछले 20 सालों में प्रदेश राजनेताओं ने सिर्फ अपनी जेबें भरी हैं और ऊपर से उत्तराखंड की भूमि की सुरक्षा के लिए भी कोई सार्थक प्रयास नही किए हैं।

दरअसल, हिमांचल प्रदेश में संविधान आर्टिकल 371 लागू है। यह आर्टिकल कहता है कि भौगोलिक चुनौतियों वाले राज्यों को अपनी भूमि सुरक्षा का विशेष अधिकार है। सात बहन (seven sister) राज्यों में से अधिकांश में यह आर्टिकल 371 लागू है। कोई प्रदेश केंद्र शासित किन कारणों से होता है, अगर आपको नही पता तो यह पढ़े। केंद्र शासित प्रदेश...
उत्तराखंड के नेताओं ने नेता बनते ही अपने पहाड़ी क्षेत्र के घर जमीनें छोड़ दी। आज जनता की बदौलत हर नेता के पास देश के दूसरे शहरों में घर, जमीन की कोई कमी नही है। कई खबरें तो ऐसी भी हैं कि उत्तराखंड के कुछ नेताओं के नाम विदेशों में भी जमीनें हैं। ऐसे में किसी नेता ने कभी आम जनता की सुरक्षा का नही सोचा। उत्तराखंड की महान संस्कृतिक विरासत का नही सोचा। आज जब लोगों के घरों से बहने, बेटियां यहां तक की पत्नियां रातों रात गायब हो रही हैं तब जाकर जनता को यह ध्यान आया कि हम कितने असुरक्षित हो गए हैं।

आज से 10-12 वर्ष पूर्व उत्तराखंड के पहाड़ी घरों में ताले लटके हुए नही मिलते थे अगर लोग खेती के काम से बाहर हैं। लेकिन आज हर घर में ताला लटकाना अनिवार्य हो गया है क्योंकि दूसरे राज्यों से आए लोग न जाने पीठ पीछे क्या कर दें। जब ऋषिकेश जैसी जगह पर शोरूम सुरक्षित नही है और दूसरे राज्यों से आये लोग फ्रीज, टीवी जैसे उपकरण उठा रहें है, तो ऐसे लोगों को नागरिकता दें भी तो कैसे ? उत्तराखंड के नागरिक अपने व्यवाहार से सबका दिल जीत लेते है, इसलिए देश ही नही बल्कि विदेशों में भी लोग सम्मान की नजर से देखतें है। लेकिन इसका मतलब यह नही है कि दूसरे राज्यों से गलत प्रवृति के लोग उत्तराखंड में आएं और मनमानी करें।

इस बार भू-कानून का मुद्दा इन्हीं सब बातों को लेकर गर्म है।  इस मुद्दे को ढ़ाल बनाकर अगर सिर्फ पहाड़ी क्षेत्र के लोग भी मतदान करें तो कोई भी पार्टी आसानी से पूर्ण बहुमत को प्राप्त कर सकती है। ऐसे में अटकलें लगाई जा रही हैं कि उक्रान्त के बाद भजपा भी इसको अपने घोषणा पत्र में शामिल कर सकती है। उत्तराखंड को अगर भू-कानून मिल जाता है तो रोजगार न सही लेकिन आने वाली पीढ़ियों के लिए जंगल, जमीन और जोरू की सुरक्षा जरूर मिल जाएगी। पहाड़ समीक्षा इस विषय पर डेढ़ साल पहले से लेख लिख रहा है। आगे भी पहाड़ समीक्षा इस विषय पर लेख लिखता रहेगा, जबतक कि उत्तराखंड पहाड़ी जिलों को उनका अधिकार नही मिल जाता। इसके साथ ही पहाड़ समीक्षा ने भूमि चैकबन्दी को लेकर भी लेख प्रकाशित किये हैं। यह भी महत्वपूर्ण विषय है जिस पर उत्तराखंड सरकार का कोई ध्यान नही है। अगर चैकबन्दी हो जाती तो पहाड़ी बंजर भूमि को आवाद करने में महज एक से दो वर्ष का ही समय लगता और पहाडी क्षेत्र फिर से धनधान्य से परिपूर्ण होते।