कम समय मे अपनी प्रतिभा का परिचय देने की चुनौती के साथ केंद्रीय उम्मीदों पर खरे उतरने का है धर्मसंकट। 2022 विधानसभा के लिए पृष्ठभूमि के लिए अहम किरदार निभाने की भी है जिम्मेदारी।

उत्तराखंड में लगातार चल रहे नेतृत्व परिवर्तन को लेकर लोगों के जो सवाल है वो तो है ही, लेकिन सबसे बड़ा सवाल केंद्र का है। गौरतलब है कि 2022 विधानसभा चुनाव के लिए अब ज्यादा वक्त नही बचा है। समय पहले नेतृत्व बदलने में खराब हुआ और फिर बदला भी तो चुने गये मुख्यमंत्री केंद्र सरकार की उम्मीदों पर खरे नही उतर पाए। समय अधिक होता तो राष्ट्रपति शासन एक विकल्प हो सकता था लेकिन अब ऐसी स्थिति है कि अगर पूर्ण बहुमत के बाद भी सरकार के पास मुख्यमंत्री न हो तो 2022 में चुनाव किस मुह से लड़ें। इसलिए आननफानन में पार्टी को एक ऐसा चेहरा चाहिए था जो केंद्र के इशारों पर काम कर सके। 


खैर, अब पार्टी और मुख्यमंत्री के आगे सबसे बड़ी चुनौती है जनता में फिर से पार्टी के लिए विश्वास को जगाना। हाल ही में हुई बड़ी गलतियों पर जल्दी से एक्शन प्लान तैयार करना और युवाओं को अपनी तरफ आकर्षित करना। आपको बताते चले कि पार्टी को सबसे अधिक इस बात की चिंता है कि युवा मतदाता कहीं पार्टी से बाहर न चला जाए। इसलिए मुख्यमंत्री के चयन के लिए युवा चेहरा तलाशा गया। धामी को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के साथ काम का लम्बा तजुर्बा है, इसलिए पार्टी के दिल्ली आकाओं को उम्मीद है कि धामी युवाओं में फिर से विश्वास पैदा कर सकेंगे।


तीरथ सिंह रावत की एक सबसे बड़ी कमजोरी जिसकी वजह से बाहर जाना पड़ा, घोषणाओं की कमी है। चुनाव पास है ऐसे में जिस स्तर पर घोषणाएं होनी चाहिए थी, तबादले होने चाहिए थे, वो नही हुए। अब धामी के कंधों पर यह जिम्मेदारी भी है कि वह अटके हुए तबादले जल्दी से पूरे करें और रिक्त पदों के लिए रोजगार की घोषणाएं करें। विकास कार्यों के लिए भी हर रोज किसी न किसी प्रकार की सुर्खी बनाये रखने की जिम्मेदारी भी नए मुख्यमंत्री के कंधों पर ही है।


कुमाऊँ के युवाओं में भाजपा को लेकर काफी नाराजगी देखी जा रही थी। जिस पर त्रिवेंद्र और तीरथ सिंह ने कोई ध्यान नही दिया था। अब पुष्कर धामी के पदभार सम्भालने के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि कुमाऊँ के युवाओं का पार्टी की तरफ झुकाव बढ़ेगा। कम शब्दो में कहा जाय तो कम समय में पुष्कर सिंह धामी के ऊपर अधिक जिम्मेदारियां है। उनके पास कोई लम्बा चौड़ा राजनीतिक अनुभव भी नही है। ऐसे में अगर पार्टी के अन्य नेताओ का सहयोग नही मिला तो धामी को मुश्किलों से गुजरना पड़ सकता है।