सुविधाओं का वर्गीकरण राजस्व को आधार न मानकर किया जाय तो पहाड़ी क्षेत्र करेंगे अच्छा विकास, राजस्व के चक्कर मे पहाड़ी क्षेत्र को धकेला जा रहा मौत के मुह में ।

भारतीय मानचित्र के उत्तरी सीमा क्षेत्र में बसा प्राकृतिक रूप से सबसे धनी राज्य उत्तराखंड अपनी जलवायु को लेकर सर्वाधिक सम्पन्न प्रदेश हुआ करता था। लेकिन आज राज्य राजस्व के चक्कर में छिन्नभिन्न कर दिया गया है। क्या बांध (डैम), क्या सड़क, क्या जंगल और क्या रेल, राजस्व के पीछे पहाड़ो को खोखला करते चले गए। इसका दुष्परिणाम देखने के बाद भी राज्य सरकारों को यह समझ नही आ रहा कि हम कर क्या रहें है? जलवायु में पिछले एक दशक में जो परिवर्तन देखने को मिला है उससे साफ है कि राज्य की प्राकृतिक धरोहर को कई गुना क्षति पहुंची है। औली क्षेत्र से बर्फ का गायब होना, समय पर बारिश का न होना, धारचूला क्षेत्र में एक माह में 30 से अधिक बार भूकम्पन का होना, शीतऋतु में जंगलों का धधकना इत्यादि बहुत कुछ इशारा कर रहें है। लेकिन सरकार को राजस्व चाहिए इसलिए हम दिन रात मकड़ी की तरह जाल बुन रहें हैं। पर, भुल गये हैं कि फँसेगा कौन ?

सड़क/रेल मार्ग के लिए बनने वाली कई सुरंगे क्षतिग्रस्त होने लगी हैं जबकि अभी वाहन/रेल का संचालन शुरू भी नही हुआ। मतलब  अभी कम्पन मुक्त (Vibration free) सुरंगे होने पर भी कई जगह दरारें पड़ने लगी हैं। बात चम्बा वाली सुरंग की हो या पाताल गंगा में एक वर्ष पूर्व निर्मित 150 मीटर लंबी सुरंग की, हम सिर्फ पहाड़ो को अस्थिरता की तरफ धकेल रहें है। पाताल गंगा में भूस्खलन रोकने के लिए एनएच ने वर्ष 2020 में सुरंग का निर्माण किया था। यहां चट्टान के बाहर से (सिमेंट से) सुरंग का निर्माण किया गया है। बीते दिनों हुई बारिश से सुरंग के शुरुआत में ही पाताल गंगा साइट पर दरारें पड़ गई हैं, जिससे हाईवे पर वाहनों की आवाजाही भी खतरनाक हो गई है।

सवाल बहुत सीधा है, कहीं हम त्वरित गति के पीछे त्वरित मौत पर सवार न हो जाएं। उत्तराखंड उच्च भूकम्प दक्षता वाले जोनों में वर्गीकृत है। देहरादून स्थिति वाडिया संस्थान ने भी धारचूला में किये एक अध्ययन से चौकाने वाले आंकड़े प्रकाशित किये हैं। फिर भी सरकारें नही जाग रही हैं। जानते हैं क्यों ? क्योंकि राजस्व चाहिए जनता की सुरक्षा नही । मझेदार बात यह है कि पहाड़ी क्षेत्र को खराब करने की सभी योजनाएं केंद्र बना रहा है और राज्य सरकार चुपचाप तमाशा देख रही है। क्या डैम, क्या राष्ट्रीय राजमार्ग और क्या रेल, सबका पैसा केंद्र को जाएगा बदलने में चंद पर्यटन से कमाई के चक्कर में पहाड़ी नागरिक 24*7 मौत के साये में रहेंगे।
उत्तराखंड के समांतर संरचना वाला देश नेपाल, जिसके पास भूमिगत संरचना में अभी तक कोई कार्य सम्मिलित नही है। 25 अप्रैल 2015, समय 11 बजकर 56 मिनट, स्थान काठमांडू में एक भूकम्पन का झटका 7.8 से 8.1 पैमाना, 9000 से ज्यादा मौतें और लगभग 22000 से अधिक लोग गम्भीर रूप से घायल।  इस खबर को ऐसे नजर अंदाज करना बहुत बड़ी मूर्खता होगा जबकि हम टैक्टोनिक प्लेट के ऊपर बैठे हों। और जब यह पता भी हो कि आप महज 30-40 किलोमीटर दूर स्थित एक ऐसी संरचना के ऊपर हैं जिसमें कभी भी बदलाव हो सकता है, फिर भी आप ऐसे पहाड़ी क्षेत्र को खोखला करने में लगें है जिसके ऊपर हाजरों जिंदगियां हैं।
धारचूला में हुए हालिया शोध ने जिस तरह के आंकड़े पेश किए, बेहद चिंताजनक हैं। उन्होंने कहा कि धरचूला क्षेत्र में एक माह में 30 से अधिक बार धरती में कम्पन हुआ और यह वह  कम्पन था जिसको वाडिया संस्थान रिकॉर्ड कर पाया। ऐसे भी कई छोटी तीव्रता के कम्पन हुए होंगे जिनको एक निश्चित तय मानक की मशीन नही पकड़ पाई। सोच कर देखिए एक ऐसे पहाड़ी क्षेत्र में 7.0 पैमाने का एक तेज झटका जहां एक बड़ा बांध और भूमिगत सुरंगे हों, किस प्रकार की जनहानि के लिए उत्तरदायी होगा। पहाड़ समीक्षा अपने लेखों में सुविधाओ के वर्गीकरण को लेकर बहुत कुछ प्रकाशित कर चुका है। लेकिन सवाल फिर वहीं पर आकर अटक जाता है कि सरकारों को तो राजस्व चाहिए।