डिग्री लिए तैयारियां कर रहें युवाओं के लिए क्या है रोजगार की नीति? संविदा पर लगे लोग कब से बेरोजगारी की श्रेणी में आने लगे भला। वेतन बढ़ाइए, नियमितीकरण कीजिए! अच्छी बात है। लेकिन, जिनके पास किसी प्रकार का आय का साधन नहीं लेकिन डिग्री है और तैयारी कर रहा है उसका क्या ?

उत्तराखंड में नेतृत्व परिवर्तन हुआ लेकिन रोजगार को लेकर गोल-मोल घोषणाएं हो रही हैं। अस्थाई रूप से कार्य कर रहे लोगों को वेतन वृद्धि और स्थाई करने की बात हो रही है लेकिन उनका क्या जो उन्हीं विभागों पर स्थाई पद निकलने के उम्मीद लेकर तैयारियां कर रहें है। अस्थाई रूप से कार्यरत कर्मचारी योग्य है भी या नहीं, यह सरकार बिना किसी स्क्रीनिंग टेस्ट के कैसे पता कर लेगी। इन घोषणाओं के बाद लगता है सरकार अभी भी युवाओं को रोजगार नही देना चाहती है बल्कि सिर्फ 2022 में वोट खींचना चाहती है।

सरकार ने कहा कि पालीटेक्निकों में कार्यरत करीब 500 प्रवक्ताओं को भी स्थायी नियुक्तियों में वरीयता दी जाएगी। तो सवाल है कि जो लोग एम.टेक जैसी डिग्रीयां लेकर बैठे हुए है उनका क्या ? न तो राज्य में पीसीएस जैसे पदों पर भर्ती की बात है और न ही ऐई (AE) के पद, तो ऐसा युवा क्या करे। साफ है कि सरकार पहले से चल रहे जुगाड़ू सिस्टम से ही आगे बढ़ना चाहती है। अगर सरकार सही तिरकों से नियमिति चाहती तो स्क्रीनिंग टेस्ट करवाती और योग्यतानुसार रिक्त पदों पर भर्ती करवाती। 

युवा इस बात पर जरूर ध्यान दें कि घोषणाओं में "किए जाएंगे" जैसे शब्दों का प्रयोग अधिक किया जा रहा है। मतलब साफ है ये हो भी सकतें है और नही भी। साढ़े चार साल एक ऐसी सरकार सोई रही जो पूर्ण बहुमत के साथ है। वह अंत छह माह में सिर्फ घोषणाएं ही कर सकती है। देखने वाली बात यह है कि इसमें भी अभी तक पूर्ण रूप से बेरोजगार या जो तैयारी कर रहें है उन युवाओं के लिए कोई राहत की खबर नही है। क्या राज्य में सिर्फ 18 हजार युवा ही बेरोजगार हैं? लेकिन 18 हजार शब्द को ऐसे प्रोजेक्ट किया जा रहा है जैसे पता नही कितना बड़ा असम्भव कार्य की घोषणा हुई है।
 
नियमितीकरण कीजिए, यह एक अच्छा कदम है। संविदा पर चल रहे कर्मियों का वेतन भी बढ़ना ही चाहिए। लेकिन यह ऐसा कार्य नही है जिसको छह माह तक खींचा जाय। आज अगर घोषणा हुई है तो 15 दिन के भीतर स्थाई नियुक्ति पत्र या अगले माह का वेतन बढ़कर मिल जाना चाहिए। इसको सरकार का सकारात्मक कदम कहा जाएगा, न कि घोषणा को... किया जायेगा। यह तो केवल उन लोगों कि बात हुई जिनके पास किसी रूप में रोजगार मौजूद है। मुद्दा तो उनका है जिनके पास रोजगार है ही नही लेकिन शिक्षा में डिग्री लिए बैठे हैं। यहां स्पष्ट कर दें कि 01 करोड़ जनसंख्या वाले राज्य में ऐसे लोग 18 हजार नहीं, बल्कि कई लाखों में हैं। उनके लिए क्या नीति है ?

2022 चुनाव को लेकर अगर सरकार संवेदनशील है तो यह उसका निजी मामला है। जैसे भाजपा पार्टी नेता बंशीधर भगत ने कहा कि हम चाहे 10 मुख्यमंत्री बदले इससे जनता को क्या ? इसी प्रकार आप अगर 2022  का चुनाव हार भी जाएं तो जनता को क्या ? जनता ने आपको 2017 से 2022 के लिए चुना था और इन्हीं पांच सालों का हिसाब जनता सरकार से चाहती है। सरकार के पास अगर सच में कोई नीति है तो कम से कम 50 हजार पदों पर अगले 03 माह में परीक्षाएं होनी चाहिए। यह उस पार्टी के लिए कोई बहुत बड़ा कार्य नही है जो एक चुनावी रैली पर 30 करोड़ रुपये खर्च कर देती है। अब अगर यह कहकर परीक्षाएं न हो पाए कि व्यवस्थाओं में वक्त लगेगा तो समझ जाइए, 2022 खत्म होते होते एक भी नई भर्ती परीक्षा पर तैनाती नही होने वाली है।