सेवा कर के रूप में लाखों रुपया चुकाने के बाद भी गांवों को सेवाओं के नाम पर कुछ नहीं, कैसा विकास है जो सिर्फ जनता के पैसे लेते समय ही दिखता है ?

वर्ष 2013 तक ₹400 से ₹500 तक मिलने वाला गैस का सिलेंडर आज लगभग दो गुनी कीमतों पर मिल रहा है। 2013 तक गैस भरने के लिए लाइनें लगी रहती थी इसलिए 2014 में जब गैस महंगी हुई और घर घर पहुंचाई जाने लगी तो लोगों ने इसका विरोध नही किया। साथ ही केंद्र सरकार ने सब्सिडी जैसा विकल्प भी रखा हुआ था, जो आज लगभग बन्द हो चुका है। जब थोड़ा बहुत विरोध हुआ तो केंद्र सरकार ने कहा कि बढ़ी हुई कीमतों का देश हित में उपयोग हो रहा है, इसलिए लोग चुप हो गए। आज गैस लगभग ₹830 प्रति सिलेंडर की दर पर मिल रहा जिस पर सब्सिडी ₹16 वापस होती है। 

गैस की कीमत पर नजर डालें तो लगभग ₹500 से कम प्रति सिलेंडर आज भी दिया जा सकता है लेकिन सेवा कर के रूप में केंद्र सरकार लगभग 330 रुपये जनता से ले रही और इसमें से कभी कभी ₹16 जनता के बैंक खातों में सब्सिडी के रूप में वापस आ रहें है। अर्थात सेवा कर (service tax) के रूप में सरकार प्रति सिलेंडर कर ₹314 सीधे खा रही। अब क्योंकि सरकार का कहना है कि यह पैसा देश के विकास में काम आ रहा है तो सड़क विकास गैस आपूर्ति के लिए प्राथमिक कारकों में से है। क्योंकि आज हर गांव हर माह गैस का उपभोग कर रहा है तो गांव के प्रत्येक परिवार से भी केंद्र सरकार ₹314 सेवा कर के रूप में प्राप्त कर रही है। अब सवाल यह है कि उत्तराखंड के दर्जनों गांवों को गैस की आपूर्ति करने के लिए 06 सालों में भी सड़क क्यों नही मिली ?

आज भी लोग सिलेंडर सर में ढोकर ले जा रहें है। कई गांव तो ऐसे भी हैं जो 06 किलोमीटर से लेकर 10 किलोमीटर एक तरफ पैदल चलकर सिलेंडर घर तक पहुंचा रहे हैं। इस बात को समझना होगा कि जब गैस ₹450 प्रति सिलेंडर थी उस समय भी शहरों में गैस भरवाने में कोई बहुत बड़ी दिक्कतें नहीं होती थी। हाँ, पहाड़ी क्षेत्रों में गैस के वाहन हर माह गैस नहीं पहुंचाते थे। जिन क्षेत्रों में वाहन गैस लेकर जाते भी थे तो वह प्रमुख सड़कों से अंदर गांवों में नही जाते थे। आज लगभग 02 सिलेंडरों की कीमत चुकाकर अगर गैस फिर भी घर पर नही मिल पा रही तो निश्चित तौर पर यह जनता के साथ धोखा है।

चमोली, टिहरी और पौड़ी जिलों में ही दर्जनों गांव ऐसे हैं जहां पर 29 किलों का सिलेंडर सर में उठाकर चढ़ाई पर चढ़ना पड़ता है। सरकार ऐसे गांवों को भी सड़क नही दे पा रही है जो महज मुख्य मार्गों से पांच- पांच किलोमीटर की दूरी पर हैं। समझने वाली बात ये है कि प्रति सिलेंडर पर वह भी ₹314 का सेवा कर हर माह बैंक की क़िस्त की तरह चुका रहा है लेकिन उसके गांव में न कोई "मेरा गांव मेरी सड़क" जैसी योजना है और न "पीएमजेएसवाई" योजना है। 

पिछले छह सालों में कितना पैसा सरकार ने लिया उसको ऐसे समझए, मान लो एक गांव जो मुख्य मार्ग से पांच किलोमीटर की दूरी पर है में 50 परिवार हैं। तो हर माह इन 50 परिवारों ने सरकार को ₹15,700 सेवा कर (service tax) के रूप में दिए। एक साल में कुल ₹1,88,400 दिए। पिछले छह सालों से 50 परिवार हर साल सरकार को ₹1,88,400 दे रहें हैं, मतलब 06 वर्षों में कुल ₹11,30,400 (ग्यारह लाख तीस हजार चार सौ) रुपये सेवा कर (service tax) के रूप में दिए। फिर भी गैस पहुंचाने के लिए सड़क नही मिली, जहां सड़के गई भी बसरात में टूटी तो मरम्मत नही हुई। अब सरकार ही समझाए कि सेवा कर (service tax) की परिभाषा क्या है ?