प्रधानमंत्री आवास योजना में सही मानकों को दरकिनार कर दिए जा रहे आवास। अनाथ व बेघर गौतम पंवार की मदद से शासन/प्रशासन ने फेरा मुह ।

यह एक ऐसे बच्चे की कहानी हैं जिसको पढ़कर शायद आपका दिल भी पसीज जाए। पहाड़ समीक्षा यूं तो जनहित की खबरें प्रकाशित करता रहता है, लेकिन चपोली गांव के इस घटनाक्रम के प्रकाश में आने से हमनें इस खबर को प्राथमिकता दी है। यह खबर प्रकाशित करना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि "सरकार" जिस तरह के वादे करती है कार्य ठीक उसके विपरीत हो रहें हैं। सरकारी योजनाओं पर जिनका हक बनता है उनको वंचित कर योजनाएं मतदाओं की संख्या के आधार पर बांट दी जाती हैं। तस्वीर बेहद चिंताजनक व निराशाजनक हैं। यह कोई काल्पनिक घटना नहीं हैं, बल्कि हकीकत है उन बच्चों कि जिन्होंने न पिता का चेहरा ही ढंग से देखा और न माँ का साथ ही लम्बे समय तक मिल सका। 


धर्म सिंह पंवार, ग्राम चपोली नामक एक फेसबुक उपयोगकर्ता ने इस घटना को उजागर किया है। उन्होंने अपनी पोस्ट में तस्वीर सांझा करते हुए लिखा है कि मेरे पड़ोस में रहने वाला गौतम सिंह पंवार, गांव में दर दर भटक रहा है। बरसात में कभी किसी के घर तो कभी किसी के घर पर दिन बिताने को मजबूर है। वजह ? उसके पास रहने के लिए अपना घर सही परिस्थितियों में नहीं है। धर्म पंवार ने लिखा कि इस बाबत उन्होंने वर्ष 2015-16 में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत गौतम के परिवार का नाम दर्ज करवाया था लेकिन किसी ने कोई सुद नही ली। जीवन का संघर्ष करती हुई गौतम की माँ भी 03 वर्ष पूर्व दुनियां से चली गई।

धर्म सिंह पंवार लिखते हैं कि जब गौतम का जन्म हुआ था उसके बाद उनके पिता परिवार को छोड़कर कहीं चले गए और फिर लौटकर नहीं आए। उनकी मां ने दो बेटे और एक बेटी को दिनरात मजदूरी करके कैसे कैसे पाला है। माँ ने जैसे कैसे बेटी की शादी भी की। लेकिन तीन साल पहले परिवार की एक मात्र सहारा रही माँ की मृत्यु हो गई। माँ के गुजर जाने के बाद शासन में बैठे लोगों ने परिवार का नाम "प्रधानमंत्री आवास" योजना से हटा दिया, बाबजूद कि गौतम के लिए कई सामाजिक संगठनों ने आवाज उठा रखी है। आज गौतम की हालत देखकर निराश धर्म सिंह ने लिखा कि, आज जब क्षेत्र में आदर्श विधायक कण्डारी "प्रधानमंत्री आवास" योजना के लाभार्थियों को आवास बांट रहे हैं तो यह देखकर बहुत दुःख हो रहा है।

धर्म सिंह लिखतें हैं कि जो दुःख इस अंधेपन को देखकर हो रहा है उसकी कल्पना करना असम्भव है। वह लिखतें हैं, हे ! गूंगी-बहरी सरकार क्या कसूर है इन गरीबों का ? सिर्फ इतना कि इनके पास वोटबैंक नही है। अपना दर्द सांझा करते हुए धर्म सिंह लिखते हैं, आज पता नहीं राज्य में कितने लोग होंगे जो गौतम पंवार जैसे असहाय हैं। वास्तव में इस अनदेखी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या योजनाओं का आवंटन भी मतदाताओं की संख्या को देखकर हो रहा है ? क्या योजनाओं के आवंटन में मानकों की कोई भूमिका नहीं है ? क्या खुद को गरीबों की सरकार बताना भी महज राजनीतिक उल्लू सीधा करने से ज्यादा कुछ नहीं ? क्या वास्तव में लोकतांत्रिक देश गूंगा और बेहरा हो चुका है ?