07 फरवरी का वह दिन रैणी गांव के लिए किसी अभिशाप से कम नही था। अब उससे भी उच्च क्षेत्र सुभाई में विस्थापन का जनता कर रही विरोध।

फरवरी माह में रैणी गांव जल आपदा में कई लोगों की जाने गई और ऋषिगंगा पर चल रहे पॉवर प्रोजेक्ट को भी भारी नुकसान पहुंचा था। इसके बाद सरकार ने विस्थापन को लेकर खूब ढोल बजाए लेकिन फिर चुपचाप सब ठंडे बस्ते में चला गया। अप्रैल-मई माह में हुई बारिश से एक बार फिर ऋषिगंगा रौद्र रूप में आई और रैणी गांव में भूक्षरण शुरू हो गया। यह दृश्य इतना भयभीत करने वाला था कि रैणी गांव के लोगों ने अपने बच्चों को रिश्तेदारों के यहां सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया और खुद रात को गुफाओं में शरण लेने लगे। इसके बाद फिर सरकार का विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ तो सरकार की नींद खुली। 

आपदा सम्भावित क्षेत्रों को लेकर वर्ष 2011 में बनाये गये नियम को लेकर पहाड़ समीक्षा पहले से ही लेख प्रकाशित कर चुका है। अगर आपने रपट नही पढ़ी तो यह पढ़ लें तभी आपको अच्छे से समझ आएगा कि आपदा प्रभावित क्षेत्रों का क्या हाल हुआ। 


अब बड़ी मुश्किल से सरकार रैणी गांव के पुनर्वास के लिए जागी तो लोग चुने गए स्थान का विरोध कर रहे हैं। दरअसल, सरकार ने पुनर्वास के लिए सुभाई गांव को चुना है लेकिन रैणी आपदा प्रभावितों का कहना है वह क्षेत्र भी आपदा प्रभावित क्षेत्रों में आता है। कहा जा रहा है कि सुभाई गांव की आवादी पहले ही ज्यादा है। ऊपर से जंगल के नाम पर बहुत थोड़ा ही क्षेत्र है जहां से लकड़ी, गाय, भैंस, बकरी का चार जुटाया जाता है। अधिकांश क्षेत्र पर शीतकाल में बर्फ पड़ जाती है। ऐसे में शीतकाल में अधिक आवादी के लिए यह स्थान उपयोगी नही है। सुभाई गांव में दलदल जैसी समस्याएं भी आम हैं।


प्राप्त जानकारी के अनुसार इस क्षेत्र में कृषि योग्य भूमि भी बहुत कम है। ऐसे में अगर जंगल पर भूमि की जाय तो मवेशियों का भरण पोषण कैसे करें। ऊपर से शीतकाल में बर्फ से परिस्थितियां और भी विषम हो सकतीं है। इस फैसले से कुछ लोग नाराज हैं और फैसले के खिलाफ विरोध के लिए एकजुट होने की बात कर रहें है। बताया जा रहा है कि यह पहले से कष्ट झेल रहे लोगों का जीवन संकट में डालने जैसा निर्णय है। अगर सरकार इस फैसले को वापस नही लेती और पुनर्वास के लिए सही जगह का चयन नही करती तो 2022 विधानसभा चुनाव का बहिष्कार होगा।