वर्षों का राजनीतिक तुजुर्बा लिए ठगे से महसूस कर रहें है सीनियर नेता। महज 10 वर्ष के राजनीतिक अनुभव वाले चेहरे को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने पर बगावत के स्वर तेज।

प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सपथ से पहले कल दिन भर अलग अलग नेताओं के नाराजगी के स्वर उठते रहे। अटकलों का दौर इस कदर था कि आशंकाएं जताई जाने लगीं कि खांटी राजनेता सतपाल महाराज और डॉ. हरक सिंह रावत मंत्री पद की शपथ लेने पहुंचेंगे भी कि नहीं। इस कड़ी में बिशन सिंह चुफाल का नाम भी सुर्खियों में रहा। खबर है कि नाराजगी दूर करने के लिए अमित शाह को बीच में कूदना पड़ा उसके बाद ही पुष्कर सिंह धामी का सपथ समारोह आयोजित हुआ।

विशेष सूत्रों से खबर है कि बिशन सिंह चुफाल हरक सिंह और सतपाल महाराज के सम्पर्क में थे। लेकिन आलाकमान से बात होने के बाद बिशन सिंह पार्टी की तरफ लौट गये और सतपाल व हरक के नाराजगी की बात कही। पूछे जाने पर बिशन सिंह चुफाल ने खुद की नाराजगी पर उठ रहे सवालों को नकार दिया। उन्होंने कहा कि नाराज नेताओं को एक बार पार्टी अध्यक्ष मदन कौशिक से बात करनी चाहिए। आपको बता दें कि खबर यह भी है कि भाजपा आलाकमान ने पहले कांग्रेस के बागी नेता सुबोध उनियाल को मुख्यमंत्री का ऑफर दिया था लेकिन उन्होंने मुख्यमंत्री बनने से इनकार कर दिया। लेकिन सतपाल महाराज को अगर इस कड़ी में नही जोड़ा गया तो इससे साफ होता है कि सुबोध उनियाल को मुख्यमंत्री की पेशकश वाली खबर झूठी है।

बैरहाल, उत्तराखंड के राजनीतिक समीकरण पूरी तरह से हिल गये हैं। खबर यह भी है कि कांग्रेस से भाजपा में गये नेताओं पर से जनता का भरोसा उठ गया है। इनपुट मिले हैं कि इस बार कुछ दबंग नेता बीजेपी की टिकट पर हार का सामना कर सकतें है। जनता का मिजाज सीनियर नेता भली प्रकार समझते हैं। ऐसे में अटकलें तेज हो गई हैं कि बागी नेता रिटर्न टिकट का विकल्प तलाशने में लग गये हैं। 

उत्तराखंड के पूर्व विधानसभा चुनाओ पर नजर डालें तो हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन होता आया है। ऐसे में अगर सत्ता परिवर्तन होता है तो दबंग छवि वाले नेताओं को भाजपा में रहकर कोई लाभ मिलने वाला नही है। बीच में एक अफवाह यह भी उड़ी थी कि सतपाल महाराज कुछ सहयोगियों के साथ जल्द ही घर वापसी कर सकतें हैं। लेकिन अमित शाह के साथ हुई घण्टों की चर्चा में क्या बात तय हुई, इसका खुलासा नही होने से अभी सब अटकलें ही हैं। राजनीतिक गणितज्ञों का कहना है कि केंद्र भाजपा का पिछले 7-8 सालों का रिकॉर्ड देखें तो उन्होंने गैर बीजेपी नेता को कहीं भी मुख्यमंत्री का चेहरा नही बनाया है। इसलिए यह उम्मीद रखना कि भाजपा अगर चुनाव जितनी भी है तो चेहरा बागी नेता का होगा, प्रतीत नही होता।