कोरोना की पहली लहर में प्रदेश भाजपा के पूरे मंत्रिमंडल ने दिया था 58,000 का सहयोग। आज दूसरे के वेतन की बारी आई तो काट दिया 50% वेतन, संवेदनहीन सरकार ।

उत्तराखंड राज्य को आंतिरक रूप से खोखला करने में सरकारों ने कोई कसर बाकी नही छोड़ी है। पांच साल के लिए चुनी सरकार के पास शुरुआती चार साल में युवाओं को देने के लिए रोजगार नही था। पांचवे साल में कोरोना की दूसरी लहर में उत्तराखंड परिवहन दो माह के लिए बन्द क्या हुआ कि सरकार के पास कर्मचारियों को देने के लिए वेतन ही नही है। अब सवाल उठ रहें है कि अगर ऐसे में कुछ युवाओं को रोजगार मिला भी और चार चार माह तक वेतन ही न मिला तो ऐसे रोजगार का क्या फायदा। चुनावी मौसम में 22 हजार युवाओं को रोजगार की घोषणा तो कर दी, लेकिन पहले तो आयोग ने ही हाथ खड़े कर दिए हैं कि अगले 03 माह में इन पर परीक्षाएं करवाना सम्भव नही है, समय लगेगा। ऊपर से सरकार के पास कर्मचारियों को देने के लिए वेतन ही नही है ।


रोडवेज संयुक्त परिषद निगम के समस्त कर्मियों को आधा वेतन दिए जाने की बात से खासा आक्रोश है। संगठन ने कहा कि परिवहन निगम निदेशक मंडल की 28वी बैठक में निगम के समस्त कार्मिकों को वेतन आधा किये जाने पर सहमित प्रदान की गई है। जिससे निगम के कर्मियों में खासा रोष पनप रहा है। उन्होंने कहा कि कोरोनाकाल के समय में निगम के कर्मचारियों ने अपनी जान जोखिम में डालकर प्रवासियों को उनके गंतव्य तक पहुंचाया। जिसके चलते निगम के अनेक क्रमिक संक्रमित होकर अपनी जान भी गवां चुके है। 

आपको बता दें कि निगम घाटे के नाम पर आधा वेतन दिए जाने की बात कर रहा है, जबकि पाँच माह से निगम के कर्मियों को कोई वेतन नही दिया गया है, जिससे वह खुद को ठगा महसूस कर रहे है। जिससे उनके व परिवार के समक्ष आर्थिक संकट गहरा गया है। बड़े बड़े दावे करने वाली प्रदेश सरकार को यह नजर नही आ रहा कि लगभग आधा साल बिना वेतन के कैसे कोई कार्य कर रहा होगा। अगर बस चालक मानिसक रूप से स्वस्थ नही होगा तो कभी भी बड़ी अनहोनी हो सकती है। उससे भी बड़ा सवाल की कटौती कर्मचारियों के वेतन से ही क्यों हो ? सभी मंत्री अपना दो माह का वेतन छोड़ दें। कोरोना काल में नेताओं ने क्या काम किया और वैसे भी क्या करते हैं। करते होते तो राज्य लगातार कर्जे में नही डूब रहा होता, बाबजूद कि प्राकृतिक सम्पदाओं को नुकसान पहुंचाकर बेच खाया।

संवेदनहीन निर्णय लेने से बेहतर होता कि परिवहन व्यवस्था के पटरी पर लौटने तक आर्थिक मदद का ऐलान करती। लेकिन यहां तो उल्टा वेतन को आधे करने की बात चल रही है। आपको याद दिलाना चाहेंगे कि कोरोना की पहली लहर में उत्तराखंड भाजपा के सभी नेताओं ने मात्र 58,000 रुपये का योगदान दिया था। ये बताता है कि प्रदेश भाजपा सरकार का जनता के प्रति कितनी बड़ी त्याग की भूमिका है। लेकिन जब दूसरे की जेब काटनी हो तो कुछ प्रतिशत से तो काम ही नही बनता सीधा 50% चाहिए, संवेदनहीन सरकार न कहें तो क्या कहें ?