साढ़े चार सालों में उत्तराखंड का बना मजाक, डबल इंजन के बाद भी निकल रहा धुंआ ही धुंआ। जनता परेशान, उठ रही राष्ट्रपति शासन की मांग।

उत्तराखंड में वर्ष 2017 में आई भाजपा सरकार के पास 70 में 57 विधायक हैं। मोदी जी की डबल इंजन की पुकार पर उत्तराखंड की जनता ने भाजपा को यह मौका दिया लेकिन 05 साल में राज्य तीसरा मुख्यमंत्री देखने की कगार पर खड़ा है। अब यह सब देख फेसबुक और ट्विटर पर तरह तरह के सवाल उठ रहे हैं। कुछ लोग कह रहें है दूसरे राज्यों की सिंगल इंजन सरकार को अस्थिर करने वालों अपनी डबल इंजन तो सही से चला लो, तो कुछ कह रहें है राज्य में युवाओं की नियुक्तियां हो चाहे न हों लेकिन मुख्यमंत्री पद पर बराबर नियुक्तियां हो रही हैं।




पूरे सोशल नेटवर्क पर तरह तरह के माजक चल रहें है। कोई लिख रहा है कि "लाओ एक और रावत, चलाते रहो यूँही दावत"। प्रदेश में पूर्ण बहुमत के बाद भी जिस तरह का मजाक भाजपा ने बनाया है उससे लोग काफी नाराज नजर आ रहें है। पिछले पांच सालों में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई पर इतनी चर्चाएं नहीं हुई जितनी उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को लेकर। पहले त्रिवेंद्र सिंह रावत को "झांपू" की संज्ञा दी गई और जब उनको हटाकर तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया गया तो उनको "झांपू-2" की संज्ञा दी गई।



अब लोग डर रहें है कि अगला मुख्यमंत्री कही कोई रावत ही न हो। आशंका जताई भी जा रही है कि केंद्र यह जिम्मेदारी डॉ धन सिंह रावत को दे सकता है। ऐसा हुआ तो उन लोगों की बात सच हो जाएगी जो लोग कह रहें हैं "लाओ एक और रावत और उडाओ दावत"।



इधर कांग्रेस को भी मुद्दा मिल गया है। क्योंकि पिछले चार सालों में भाजपा के राज में प्रदेश की पूरे भारत में जिस तरह से थू-थू करवाई गई है उससे राजनीति के गलियारों में खूब चर्चा है। पहले सबसे फिसड्डी मुख्यमंत्री दिखाया गया और फिर कोरोना में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को लेकर पहाड़ी राज्य में सबसे फिसड्डी। उत्तराखंड एक ऐसा राज्य जिसमें असीम संभावनाएं हैं को भाजपा राज में ये दिन देखने पड़े बाबजूद की सरकार पूर्ण बहुमत के साथ बनी थी।



अब लोग यहां तक कहने लगे हैं कि रहने दो, हमे नही चाहिए मुख्यमंत्री। आप राष्ट्रपति शासन लगा दो। क्योंकि उत्तराखंड की हालत पहले ही इतनी खराब है कि रोडवेज कर्मचारियों को देने के लिए वेतन नही है। ऐसे में एक मुख्यमंत्री का वेतन/पेंशन तो बचेगी। साफ है अब लोग समझने लगे हैं कि राजनीति सिर्फ निजी फायदे का सौदा बनकर रह गया है। सामाजिक हित से ज्यादा पार्टी हित हो गया है। हालांकि अभी भी कुछ लोग चेहरे से ज्यादा पार्टी को हो प्राथमिकता दे रहें है। लेकिन उनको अपनी इस भूल के अंत में हर बार ऐसा ही कुछ देखने को मिलेगा जैसा की भाजपा मुख्यमंत्री बदलकर कर रही है। क्योंकि वजन व्यक्तित्व का होता है पार्टी का नहीं।