त्रिवेंद्र रावत के अनुसार भूकानून पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खण्डूरी के वक्त लाया गया। शायद उत्तरांचल राज्य गठन के समय त्रिवेंद्र रावत जी सोए हुए थे या उन्होंने जो पढा था वह भूल गए ।

चार साल के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत आज कल भाजपा की सभी गलत नीतियों को सही ठहराने पर लगे हुए हैं। बात चाहे भू-कानून की हो या देवस्थानम बोर्ड की, उनकी राय सबसे अलग ही नजर आती है। हालांकि उनकी बयान बाजी से उनकी ही सरकार कोई इत्तिफाक नही रखती है शायद, इसलिए वह कभी कोरोना वायरस के जीने की अधिकार की बात करतें हैं तो कभी तीन टांग वाली फ्रीज को दान करने की पब्लिसिटी। अब उनका कहना है कि भू-कानून की याद कांग्रेस को चुनाव के वक्त ही क्यों आती है ? तो साहब यह कांग्रेस का नहीं जनता का अधिकार है, और जनता कब क्या मांगेगी यह इस बात पर निर्भर नहीं करता की सरकार किसकी है।


जब उत्तरांचल अलग राज्य बना था तो राज्य को भू-कानून पूरी शक्तियों के साथ मिला था। लेकिन 2002 में प्रदेश भाजपा सरकार ने 500 वर्ग मीटर जमीन प्रति व्यक्ति बाहरी लोगों को देने का फैसला लिया। उसके बाद फिर 2007 में प्रदेश में भाजपा की सरकार आई तो यही मानक 500 से घटाकर 250 वर्ग मीटर प्रति व्यक्ति कर दिया गया। उसके बाद 2018 में फिर से भाजपा ने इस भू-कानून के साथ छेड़छाड़ की और बाहरी लोगों के सभी प्रतिबंध हटा दिए। क्या ये बात जनता को बताएंगे त्रिवेंद्र रावत जी आप ? 

अब ये मत कहिएगा कि ये बात कांग्रेस ने आपको नहीं बताई थी इसलिए आपको पता नहीं थी। जनता को मूर्ख कब तक बनाओगे, चाहे अगले पांच साल और सत्ता में आपको बैठने का मौका ही क्यों न मिल जाए। लेकिन, एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब आपकी ही आने वाली पीढ़ी में कोई यह जरूर सोचेगा कि भौगोलिक परिस्थितियों वाले इस प्रदेश के अधिकारों को खोखला किसने किया।