भू-कानून कोई चुनावी मुद्दा नहीं है, इस बात को समझ ले राज्य का युवा तो अच्छा होगा। आज प्रदेश जिन परिस्थितियों का सामना कर रहा है उसके लिए यही राजनीतिक दल जिम्मेदार हैं। भू-कानून भौगोलिक परिस्थिति वाले राज्यों की रीढ़ है और उत्तराखंड में यह रीढ़ बदकिस्मती से तोड़ दी गई है।


भू-कानून सिर्फ उन राज्यों में लागू होता है जो भौगोलिक परिस्थितियों की मार झेल रहें हैं। भौगोलिक परिस्थितियों की मार झेल रहे राज्यों में इस कानून का वर्गीकरण निम्नवत होता है। इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी, त्वरित सेवाओं जैसे रेल, आयुयान व मूलभूत जैसे स्वस्थ्य, शिक्षा इत्यादि की कमी, रोजगार की कमी, प्रति व्यक्ति आय की कमी जैसे मुद्दे भौगोलिक परिस्थिति को परिभाषित करते हैं। इसके आलवा किसी राज्य को अलग करने के कारणों में दो कारण कई बार और भी होतें है, जिसमे पहला है संस्कृतिक और दूसरा है राजनीतिक। इस लेख को शुरू करने से पहले, अगर आप यह नही समझ पा रहें है कि भू-कानून की मांग क्यों उठ रही है तो यह लेख अवश्य पढ़े। पहाड़ समीक्षा लेख - भू-कानून की मांग क्यों ?

उत्तराखंड अलग राज्य क्यों बना ? 
उत्तराखंड अलग राज्य बनने के पीछे दो वजह मुख्य रूप से कार्य कर रही थी। पहली भौगोलिक परिस्थिति और दूसरी सांस्कृतिक वजह। उत्तर प्रदेश के लखनऊ शासन काल में यह मान लिया गया था कि लखनऊ से बैठकर पहाड़ी क्षेत्र का विकास सम्भव नही है। क्योंकि लखनऊ से पहाड़ी क्षेत्र तक न तो पहुंच बनाना इतना सुगम था और न ही वहां से विकास कार्यों का निरक्षण सही से हो सकता था। इसके आड़े आ रही थी पहाड़ी क्षेत्र के भौगोलिक स्थिति। सांस्कृतिक कारण यह था कि उत्तराखंड का गढ़वाल मण्डल तो उत्तर प्रदेश की संस्कृति से बिल्कुल भी मेल नही खाता था और कुमाऊँ की संस्कृति सिर्फ उन जगहों पर मेल खाती थी जो कुमाऊँ की सीमा में पड़ते थे। दोनों कारणों से संरक्षण जरूरी था इसलिए यह मुद्दा राजनीतिक तौर पर गर्म हो गया। 

राज्य गठन के दौरान कुछ लोग अलग राज्य के विरोध में थे। उनमें से एक गोविंद बलभ पंत भी थे। वजह थी इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और रोजगार के लिए संसाधनों का बड़ा अभाव। अगर राज्य बनाते तो उत्तर प्रदेश का कर्जा चुकाते चुकाते बहुत वक्त बीत जाता और विकास कुछ होता ही नही। राज्य बनने के बाद हुआ भी यही। चूंकि प्रदेश का बंटवारा भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर हुआ था इसलिए संविधान के अनुसार राज्य को भू-कानून सुरक्षा दी गई। यह अकेला उत्तराखंड के साथ नही हुआ। हर उस राज्य को भू-कानून मिला जिसकी अलग होने की वजह में भौगोलिक परिस्थितियां शामिल थी। ऐसा होने की वजह वही सब हैं जो ऊपर लिखी गई हैं।

उत्तराखंड राज्य को यह सुरक्षा उत्तर प्रदेश जमीदारी विनाश एवं भू-सुधार अधिनियम 1950 के तहत मिली। क्योंकि राज्य आंदोलन में शामिल लोगों को उस वक्त गोविंद बलभ पंत की बातें समझ नही आई, इसलिए अलग विधानसभा वाला राज्य बनने की घोषणा हुई। अगर आप राज्य निर्माण के बारे में नहीं जानते और पढ़ना चाहते हैं तो यह लेख पढ़े - उत्तराखंड राज्य गठन 09 नवम्बर 2000 को पहली बार देश का 27वां राज्य उत्तराखंड कागजों में दर्ज हुआ ही था कि महज दो साल में ही राजनीति के अल्पबुद्धि जीवियों ने भू-कानून से छेड़छाड़ शुरू कर दी। क्योंकि उनको इस बात से कोई फर्क नही पड़ता था कि राज्य की भौगोलिक परिस्थिति क्या है ? उनको बस अपनी राजनीति चमकानी थी। इसलिए वर्ष 2002 में भू-कानून से छेड़छाड़ हुई और बाहरी लोगों को 500 वर्ग मीटर जमीन खरीदने का कानून पास हुआ। फिर 2007 में इसको घटाकर आधा अर्थात 250 वर्ग मीटर कर दिया गया। और वर्ष 2018 में भू-कानून पूर्ण रूप से खत्म कर बाहरी लोगों को राज्य में जमीन खरीदने व बेचने की रोकटोक से आजाद कर दिया गया। 

यहां ध्यान केंद्रित कीजिए, वर्ष 2002 में राज्य सरकार बीजेपी की, 2007 में राज्य सरकार बीजेपी की और 2018 में राज्य सरकार बीजेपी की । मतलब साफ है कि राज्य का भू-कानून सिर्फ और सिर्फ बीजेपी सरकार ने ध्वत किया। भू-कानून जैसे जैसे कमजोर होता गया प्रदेश में बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, अव्यवस्था बढ़ती गई। आज प्रदेश जिस स्थिति में खड़ा है उसके लिए अगर कोई सरकार सर्वाधिक जिम्मेदार है तो वह है भाजपा सरकार। फिर भी लोग आज उसी सरकार से भू-सुरक्षा कानून की मांग कर रहे हैं। आज अगर वह सरकार फिर से 500 वर्ग मीटर वाली शर्त पर बाहरी राज्यों को जमीन खरीदने का कानून बना कर पूर्ण बहुमत हासिल कर ले तो यह उस सरकार द्वारा जनता के साथ विश्वासघात होगा जिसका 100% बाहरी राज्य नागरिक भू-अधिग्रहण प्रतिबंध कानून पूर्णरूप से हटा दिया था।

क्या राज्य भाजपा सरकार इतने सालों में हुए भूमि भ्रष्टाचार का हिसाब कर देगी ? राज्य के युवाओं के रोजगार को बाहरी राज्यों के युवाओं के साथ बांटने का हिसाब देगी ? या सिर्फ झूठे प्रचार से युवाओं का शोषण ही करती रहेगी। क्या प्रदेश सरकार खुलकर युवाओं को बताएगी कि उनका रोजगार किसने छीना ? या यूँही बैनर थमा कर भाड़े का टट्टू बनाना पसंद करेगी? प्रदेश की भौगोलिक परिस्थिति तो आज भी ठीक नही है क्या दोनों मण्डलों को केन्द्र शासित करके अलग अलग राज्य नही बना देने चाहिए ? दर्जनों गांवों में सड़क, स्कूल और स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर कुछ नही है। क्या इसका जवाब उत्तर प्रदेश सरकार से मांगे जनता ? जी.बी पंत के नाम से तकनीकी विद्यायल बनाने से विकास नही होगा। इसके लिए उनके जैसी दूरदर्शी सोच का होना भी बेहद जरूरी है। आज कांग्रेस भी कह रही है कि हम आएंगे तो भू-कानून लाएंगे। जब हर पांच-पांच साल के अंतर पर सरकार में आए तब 500 और 250 वर्ग मीटर से तो वापस ला न सके और आज बात करते हैं कि हम लाएंगे। आज भी समय है भू-कानून को पुनः संशोधन के साथ वापस लाइये। जितना गन्द भरा था उसको भी राज्य में ही रख लीजिए लेकिन अब और मत भरिए और युवाओं के रोजगार व पहाड़ी क्षेत्र के विकास पर ध्यान केंद्रित कीजिए।