उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड को कम आंकने की कोशिश से पता चलता है कि नेताओं से खुद सही से शिक्षा ग्रहण नहीं की। बेतुके तर्कों से लाद रहे हैं सीबीएसई, ऐसा बोर्ड जिससे पढ़कर बच्चे हिन्दी भी नही लिख पाते हैं।

प्रदेश में अटल उत्कृष्ट स्कूल जैसी व्यवस्था के कारण राज्य में माध्यमिक स्तर पर दोहरी व्यवस्था बन चुकी है। 189 स्कूल अब सीधे सीबीएसई से संबद्ध हो चुके हैं। जबकि बचे करीब 2200 स्कूल उत्तराखंड बोर्ड के अधीन हैं। भविष्य में अधिकांश स्कूलों के सीबीएसई से संबद्ध होने पर उत्तराखंड बोर्ड का औचित्य ही खत्म हो जाएगा। एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि इससे दूरगामी परिणाम होंगे। सीबीएसई हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर बेहतर बोर्ड हैं लेकिन उत्तराखंड बोर्ड राज्य की अपनी पहचान है। सीबीएसई को तरजीह देने के बजाए उत्तराखंड बोर्ड को ही बेहतर करने का प्रयास भी होना चाहिए। 


उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड बोर्ड कभी शिक्षा के आयामों के लिए  जाना जाता था। पाठयक्रम की सुदृढ़ता के कारण बच्चे शिक्षा का बेहतरीन स्तर प्राप्त करते थे। लेकिन, बोर्ड के पाठयक्रम के साथ लगातार हुई छेड़छाड़ से आज पाठयक्रम की सुदृढ़ता खत्म हो चुकी है। ऐसे में उत्तराखंड बोर्ड का सीबीएसई के हाथों में जाना ठीक ऐसा है जैसे उत्तराखंड बोर्ड के अस्तित्व को खत्म करना। इस निर्णय को सीधे तौर पर विवेकहीन निर्णय कहा जा सकता है, क्योंकि एक तरफ तो बतौर शिक्षा मंत्री निशंक ने कहा था कि बच्चों को क्षेत्रीय भाषाओं में पाठयक्रम करवाया जाय और दूसरी तरफ राज्य शिक्षा मंत्री कहते हैं कि राज्य स्कूलों की कमान सीबीएसई सम्भाले, तो राजनीति शिक्षा को कहां ले जाना चाहती पहले यह साफ करें।

पहाड़ी जिलों में चौपट चल रही स्कूल शिक्षा का उत्थान सिर्फ इस बात पर निर्भर नही करता कि शिक्षा का माध्यम क्या है। बदकिस्मती से उत्तराखंड सरकार के नेताओं को आज तक पहाड़ी जिलों में गिरते हुए शिक्षा के स्तर का कारण ही पता नहीं चल पाया है। आज सब इलाज के लिए डॉक्टर बनकर घूम तो रहें है लेकिन जब बीमारी का पता ही नही तो अलग अलग दवा देकर नेता क्या सिद्ध करना चाहते हैं ? पहले यह साफ करें। माध्यम हिंदी होना अगर शिक्षा के गिरने का कारण होता तो शहरी सरकारी स्कूलों पर सबसे पहले ताले लटके हुए मिलते, लेकिन ऐसा नही हुआ। बेहतर होगा कि मंत्री पहले खुद किसी अच्छे अध्यापक से शिक्षा लें और उसके बाद उत्तराखंड बोर्ड की भूमिका पर सवाल खड़े करें।