114 दिनों के रिपोर्ट कार्ड के आधार पर तीरथ सिंह को दिखाया गया बाहर का रास्ता, सरल व्यक्तित्व के कारण नहीं समझ पाए पार्टी की भीतरी चाल।

महज 114 दिनों के कार्यकाल में तीरथ सिंह रावत सियासत को समझने में फेल रहे। भाजपा अपनी डूबती हुई साख को बचाने के लिए जिन फैसलों को चाहती थी, तीरथ सिंह वैसे फैसले लेने में नाकाम रहे। राजनीतिक गणितज्ञों का कहना है कि यही मुख्य वजह है कि तीरथ सिंह को अपनी कुर्शी को छोड़ना पड़ा। अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंपते हुए उन्होंने संवैधानिक कारणों का हवाला जरूर दिया लेकिन दिल्ली से लौटने के बाद तीरथ सिंह इतना तो जान ही गये कि पार्टी के कुछ नेता उनका रिपोर्ट कार्ड बराबर केंद्र को भेजते रहते थे। कुछ लोगों का मानना है कि तीरथ सिंह सीधे स्वभाव के व्यक्ति हैं इसलिए राजनीति में चल रहे नए तरह के दांवपेंच को वह समझ नहीं पाए और कुर्शी छोड़नी पड़ी।


पिछले दो सालों में राज्य में भाजपा के नेतृत्व को लेकर कई सवाल उठ रहे थे। यही वजह थी कि त्रिवेंद्र सिंह रावत को कुर्शी से हटाया गया था। भाजपा 2022 विधानसभा चुनाव हार न जाए इसके लिए आलाकमान पूरा जोर लगा रही है। क्योंकि हाल ही में पूरी केंद्रीय ताकत झोंकने के बाद भी पश्चिम बंगाल में जिस तरह की शर्मनाक हार हुई, उससे मोदी और उनके सिपहसालार अभी उभरे नहीं है। इसलिए चिंता यही है कि कहीं उत्तराखंड में भी यही हुआ तो मोदी नाम की नाव डूब जाएगी और उस पर सवार पूरा भाजपा तंत्र भी खतरे में आ जाएगा। वैसे भी राजनीति में कोई किसी का सगा नही होता, यह बात कुर्शी छोड़ते समय तीरथ सिंह भी समझ गये होंगे।


तीरथ सिंह की विदाई के लिए हाई कोर्ट द्वारा की गई टिप्पणी को वजह बताया जा रहा है। जिसमें हाई कोर्ट ने चारधाम यात्रा शुरू करने को लेकर जल्दबाजी, कोविड काल में महाकुंभ की भीड़, रोडवेज कर्मचारियों के मामले में ढिलाई आदि को लेकर गंभीर टिप्पणियां की, जिससे सरकार असहज हुई। तीरथ सिंह को लेकर यह भी कहा जा रहा है कि सौ दिन से अधिक के कार्यकाल में मुख्यमंत्री जिलों में अफसरों के तबादले तक नहीं कर सके। इन सब बातों का रिपोर्ट कार्ड कुछ मंत्री बराबर केंद्र तक पहुंचाते रहे और नेतृत्व मजबूत करने को लेकर केंद्र को 2022 विधानसभा की याद दिलवाते रहे। यही वजह है कि अचानक दिल्ली से फोन आ गया और आननफानन में तीरथ सिंह दिल्ली दौड़ गये।