घरों को छोड़ तंबुओं की शरण मे लोग, 24 साल से सरकार मौन। आखिर चेतावनी के बाद भी इतनी बड़ी लापरवाई क्यों ? 2011 का पुनर्विस्थपन एक्ट भी नहीं आया काम ।

मस्ताड़ी गांव, जिला मुख्यालय से महज 10 किलोमीटर दूर टैंट लगाकर जीवन बसर करने को मजबूर हैं लोग। शायद प्रशासन उनकी तकलीफों से आंखें फेर ली हैं। इस गांव को बचाने के लिए सुरक्षात्मक कार्यों की भूवैज्ञानिक की सलाह भी फाइलों में ढेर में दबी हुई है। जी हाँ, उत्तरकाशी के मस्ताड़ी गांव के लोग 24 सालों से खौफ के साये में जी रहे हैं। लेकिन प्रशासन शायद किसी अनहोनी का इंतजार कर रहा है। भूवैज्ञानिक ने गांव में तत्काल सुरक्षात्मक कार्य का सुझाव दिया था। लेकिन 24 साल बाद भी प्रशासन की नींद नहीं टूटी है।


मस्ताड़ी गांव में वर्ष 1991 में आए भूकंप के बाद भू-धंसाव शुरू हो गया था। भूकंप में गांव के लगभग सभी मकान ध्वस्त हो गए थे। बस गनीमत यह रही कि किसी की जान नहीं गई। बीते 24 वर्षों में गांव धीरे-धीरे धसता जा रहा है। धसाव के चलते रास्ते ध्वस्त हो रहे हैं, बिजली के पोल तिरछे हो चुके हैं और पेड़ भी धस रहे हैं। इसी गांव में रहने वाली एक महिला बताती हैं कि उनकी शादी तीन साल पहले हुई थी और वे तभी से घरों में नीचे से आ रहे पानी की समस्या को देख रही हैं। जिसके चलते मकान लगातार बैठ रहा है।

ग्रामीणों ने बताया कि वर्ष 1997 में प्रशासन ने गांव का भूगर्भीय सर्वेक्षण भी कराया था। भूवैज्ञानिक ने गांव में तत्काल सुरक्षात्मक कार्य का सुझाव दिया था। लेकिन सब कुछ ठंडे बस्ते में चला गया। पूरे गांव में लगभग हर तीसरे घर में भूमिगत जल रिसाव हो रहा है जिसके कारण घर धस रहे हैं और घरों में दरारें बन गई हैं। इसकी शिकायत कई बार स्थानीय प्रशासन से करने के बाद भी कोई सुद लेने वाला नहीं है।