उत्तराखंड में इन दिनों राजनीति चरम पर है। हर कोई फेरबदल, खरीद फरोख्त कर किसी भी तरह जीत दर्ज करना चाहता है। राज्य की वर्तमान सरकार ने पहले ही मुख्यमंत्री को बदलकर मास्टर स्ट्रोक खेल दिया था। मुख्यमंत्री के बदलने से पूर्व में हुई सभी गलतियों पर भाजपा ने पर्दा डालने की कोशिश की है और लंबे समय तक युवाओ के भविष्य से खिलवाड़ के बाद सबसे पहले उन्हीं को रिझाने की कोशिश भी की। जिस सरकार को बीते चार से अधिक वक्त तक विभागों में रिक्तियां नजर नही आ रही थी, अचानक 22000 पद खाली नजर आने लगे और नए मुख्यमंत्री धामी की विजय यात्रा की टैग लाइन बन गई। 

हालांकि कम उम्र और तजुर्बे के कारण धामी को मुख्यमंत्री बनाये जाने से कई नेताओं ने अपनी नाराजगी भी व्यक्त की लेकिन भाजपा कांग्रेस के बागियों पर भरोषा नही जताना चाहती थी , यही वजह रही कि उनको तबज्जो नही दी गई। अब ऐसे नेता छटपटा रहे हैं कि किसी तरह दोबारा कांग्रेस में एंट्री हो जाए। आपको बता दें कि हरीश रावत बागियों को "उजाड़ के गोरू" की संज्ञा भी कई बार दे चुके हैं। हरीश रावत ने बहुत पहले ही यह साफ कर दिया था कि बागी अगर माफी मांग ले और पार्टी में लौट आए तो उनको अपनाया जा सकता है। भाजपा में शामिल हुए कुछ अब वापसी के संकेत दे भी रहें है, लेकिन अब कांग्रेस के कुछ विधायक इसका विरोध कर रहें है।

बात भी सही है। जब पार्टी के बुरे दिन हों उस वक्त जो साथ छोड़ दे और अच्छे दिनों की आश में लौटे तो ऐसे में उन विधायकों की बातों की नजरअंदाजी करना सही नही जो पार्टी के साथ बने रहे। आज कांग्रेस दोनों तरफ से खींचतान का विषय बन गई है। पार्टी विधायक कह रहे हैं कि बागियों को मलाई चाटने नही आने देंगे तो, आलाकमान के लिए दबंगों को वापस लाने की चुनौती से दो चार होना पड़ रहा है। खैर, राजनीति में कोई किसी का सखा नही लेकिन मलाई चाटने वालों के बिना राजनीति का शायद भविष्य भी नही। यही वजह है कि विरोधी भी एक ही थाली में खाना खाते नजर आ जाते हैं।