सुप्रीम कोर्ट से बहुत समय बाद कोई ऐसा फैसला निकलकर आया जो वर्तमान केंद्र सरकार के दबाव से मुक्त नजर आ रहा है। फोन टेप मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जिस प्रकार की टिप्पणी की उससे भाजपा की बेचैनी बढ़ी हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने इजराइली स्पाईवेयर ‘पेगासस’ के जरिये भारतीय नागरिकों की कथित जासूसी के मामले की जांच के लिए बुधवार को विशेषज्ञों की एक समिति का गठन किया। प्रधान न्यायाधीश एन वी रमण, न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की पीठ ने कहा कि इस तीन सदस्यीय समिति की अगुवाई शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश आर वी रवींद्रन करेंगे। 

विपक्षी दल कांग्रेस ने संसद में पेगासस मामले पर सरकार से तीन बड़े सवाल पूछे थे। लेकिन उस समय जानबूझकर ऐसा माहौल बनाया गया था इसके पीछे कांग्रेस का ही हाथ है। विपक्षी दल ने कहा था कि पेगासस को किसने खरीदा ? क्योंकि इसे कोई प्राइवेट पार्टी नहीं खरीद सकती, इसे सरकार ही खरीद सकती है। किन लोगों पर इसे इस्तेमाल किया गया? और क्या पेगासस का डेटा किसी और देश के पास भी है या सिर्फ भारत सरकार के पास है ? लेकिन उस वक्त मोदी सरकार ने इस मामले को किसी भी तरह से दबाने की कोशिश की और संसदीय कार्यवाही आगे नही बढ़ी।

अब मामले की गम्भीरता और नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के मध्यनजर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने विशेषज्ञों के पैनल से जल्द रिपोर्ट तैयार करने को कहा और मामले की आगे की सुनवाई आठ सप्ताह बाद के लिए सूचीबद्ध की। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार के सभी सुझाओं को नकार दिया और इस मामले की निष्पक्ष जांच के आदेश जारी करते हुए सरकार से स्वतंत्र कमिटी गठित की है।