वेतनमान सुनते ही सरकारी कर्मचारियों के चेहरे खिल जातें हैं लेकिन इसका फायदा बहुत कम वर्ग ही उठा पा रहा है। इस व्यवस्था के आने से फायदे कम और नुकसान ज्यादा हुए। आज जो सरकारें वित्त का रोना रो रही हैं उसकी वजह भी यही वेतमान है न की नौकरियां। जो पैसा पहले रिटायरमेंट के बाद खर्च होता था उससे कई गुना अधिक पैसा पहले ही हर पाँच साल में लूटा देती है। सरकारी कर्मचारियों को जो पैसा पेंशन के रूप में मिलता था वह दरअसल कर्मचारियों के वेतन में से कटने वाले पैसे से ही मैनेज किया जा सकता था। इसमें ठीक वही प्रक्रिया को तेज करने की आवश्यकता थी जो बैंक आम नागरिक के पैसे के साथ करती है और बदले में महज 6% से 8% ब्याज देती है। यह भार पहले इस रूप में भी कम था क्योंकि  सेवानिवृत्त होने के बाद अगर इस संख्या में मात्र 3%से4% की गिरावट भी सरकार के राजकोष को बचा सकती थी। आज यह मौका सरकार के पास नही है क्योंकि उन्होंने बीच बीच मे वेतमान देकर इसको न सिर्फ खो दिया है बल्कि कर्मचारियों से प्राप्त टैक्स से ज्यादा सरकार पर भार बढ़ा दिया है। परिणामस्वरूप रोजगार में भारी गिरावट और महंगाई में उछाल देखने को मिला है।



विभिन्न राज्य पुरानी पेंशन की मांग क्यों कर रहें हैं?

वेतनमान योजना को बिना किसी व्यापक अध्ययन के लागू किया गया था। इसके दुर्गामी परिणाम क्या होंगे यह तब की केंद्र सरकार ने नहीं आंकलित किया था, लेकिन अब विपक्ष में आने के बाद उनको यह महसूस हुआ है कि वास्तव में यह जनता तथा सरकार दोनों के ही हित मे नहीं हैं। यही वजह है कि पुरानी पेंशन प्रणाली चुनावी घोषणाओं का हिस्सा बनती जा रही है और तबकी केंद्र सरकार जो कि आज का विपक्ष है, इस बात का समर्थन कर रही है। पेंशन प्रणाली का नष्ट होना ही वह पहला कारक है जिसकी वजह से रोजगार इतना प्रभावित हुआ है। अगर आप आंकड़ो पर ध्यान देंगे तो वेतमान वर्ष 2006 के आसपास से शुरू हुआ था और इसके ठीक चार से पांच साल बाद से नौकरी में लगातार गिरावट देखने को मिलने लगी। यह गिरावट पहले चार-पांच वर्षों में इसलिए नजर नही आई क्योंकि वेतमान में स्लैब्स प्रणाली है और पहली बार के वेतमान वृद्धि में  सरकारी वित्त पर खासा कोई असर नहीं पड़ा। इसके बाद लगातार यह बोझ बढ़ता गया और नौकरियां कम होती चली गई।


बुढापा नही है सुरक्षित:-

आज जो लोग 60 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त लेकर आते हैं उनमें से एक बड़ा तबका (लगभग 70-80%) अपने आप को असहाय महसूस करता है। क्योंकि जीवन भर की सेवा के बदले जो मिलता है उसको बच्चों के लिए खर्च करना पड़ता है। ऐसा अगर नहीं करते हैं तो उनके सामने अपनी औलाद को बेरोजगार देखने का खतरा बना हुआ है। वेतमान बढ़ा तो 2006 के बाद से महंगाई का ग्राफ भी लगातार बढ़ता गया। शिक्षा, स्वास्थ्य, खाने पीने के सामग्री और जमीन व भवन के दाम लागातार वेतमान की गति से बढ़ते गए, इसलिए जितना पैसा आया वह सब परिवार के रखरखाव में व्यय हो जाता है। अंत मे ले देकर जो जमा पूंजी होती है वह बचती है अगर बच्चे खुद के पैरों पर खड़े हो गए। यदि, नहीं तो वह भी उनकी सुरक्षा पर खर्च करने पड़ते हैं। उसके बाद खुद के लिए कुछ नही बचता है और जीवन दूसरों पर आश्रित हो जाता है। इसी कड़ी में नेताओं के लिए यह सुविधा बरकार रही है और एक नही बल्कि जितने बार के विधायक हुए उतनी पेंशन हो गई। अब जन प्रतिनिधि तो पूरे मझे में है लेकिन जिसने उसको जन प्रतिनिधि बनाया वह भीख मांगने की स्थिति में है बाबजूद की उसने 30 से 40-45 वर्ष की जनहित सेवा दी है।


क्यों लागू होनी चाहिए पेंशन व्यवस्था:-

वेतनमान प्रणाली को जितनी जल्दी हो सके सरकार को बन्द कर देना चाहिए। उसके स्थान पर महंगाई के अनुसार भत्ते का प्रावधान होना चाहिए जिसके अनुसार कर्मचारी को वेतन में वृद्धि मिलेगी। इसके अलावा सरकार को बैंकों पर यह जवाबदेही तय करनी चाहिए कि वह सरकार के कर्मचारियों के वेतन से कटौती किये गए पैसे से उसी तरह का इन्वेस्टमेंट करती रहे जिससे यह जमा पैसा तय (सेवानिवृत्त तक) वर्षों में प्रति व्यक्ति के हिसाब से सालाना कटौती 50 गुना से अधिक हो जिसके अनुरूप उस कर्मचारी की पेंशन का प्लान बनाकर सेवानिवृत्त के बाद दिया जा सके। इससे सरकार के पास पूर्व से ही प्रत्येक सरकारी कर्मचारी की जमापूंजी का ब्यौरा रहेगा और उसी आधार पर कर्मचारी को सेवानिवृत्त के बाद लोन देने का प्रावधान भी तय होगा। इससे न बैंकों को यह भय रहेगा कि यदि कर्मचारी नहीं रहेगा तो लोन कौन चुकाएगा और न पैसों के आंकलन का अभाव।