त्रिमल चंद लोकगाथा


यह लोकगाथा कुमाऊँ क्षेत्र की प्रसिद्ध व लोकप्रिय लोकगाथाओं में एक है । त्रिमल चंद के पिता विजय चंद की अयोग्यता के कारण कुमाऊँ के तात्कालिक राजा की मृत्यु के बाद राज्य की सम्पूर्ण बागडोर राज्य के मंत्रियों के हाथों में चली जाती है । मंत्रियों ने अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए अंदर ही अंदर दमन का खेल शुरू कर दिया । यह देखकर कुमाऊँ पर अनेक राजाओं ने धाबा बोल दिया । कुँवर त्रिमल चंद को भी कुमाऊँ से भागकर गढ़वाल क्षेत्र के राजा की शरण लेनी पड़ी । किन्तु राज्य से बाहर रहकर त्रिमल चंद रणनीति बनाते रहे और सन 1625 से 1638 तक कुमाऊँ की गद्दी पर शासनारूढ़ रहे । त्रिमल चंद के इसी संघर्ष पर आधारित यह लोकगाथा, आगे पढ़ें ।


जब कुमाऊँ राजाहीन हो जाता है और राज्य की डोर मंत्रियों के हाथों में चली जाती है जिसको वे अम्भालने में नाकाम हो जाते हैं और अत्यार की सीमाएं बढ़ जाती है । राजा का जनता के प्रति जो उत्तरदायित्व होता है वह भी छिन्न-भिन्न हो जाता है । ऐसे में राज्य की जनता प्रार्थना करती है- हे धरती, आसमान, पवन, पानी और राज्य के समस्त कुल देवी-देवताओं हम पर दया करना । हम पर अपनी छाया-माया बनाये रखना ईश्वर । कुमाऊँ का राज्य कैसा सुनसान हो गया है ? कुमाऊँ के राजा तो सम्पन्न और सुसमृद्ध दरबार वाले थे । हे ईश्वर ! यहाँ के राजवंश में ये कैसे भाँग के पौधे जम गये ? हे कुमाऊँ के सम्राट तुम्हारी कभी सात पंक्तियों की सभा हुआ करती थी । आज वह कहां छिन्न-भिन्न हो गयी ? सुहावने चंपावत गढ़ का सूर्य धुंधलाने लगा है । माल भाभर में शेख और सैय्यद पठान आ गए हैं । भाभर में भारदास मुगल, सवाचन जाट और नीलचंद कठायत जैसे अत्याचारी आ गये हैं । जिस मार्ग से होकर नमक गुड़ जैसी जीवन उपयोगी वस्तुएं तराई भाभर से होकर आती थी, वह भी बन्द हो गया है । इस राज्य में अपना न कोई दल बाकी है और न सेना, जो हमको संकट से मुक्ति दिला सके ।

चार आलों के चार कुमाऊँनी वृद्ध बैठे हुए थे । चौधरी ,बोहरा,कार्की और तड़ागी । ये अभी धर्म में श्रेष्ठ थे । देव ढेक,महर और फरत्यालों के साथ साथ सोलह सामंत और बारह प्रकार के अधिकारी और उनकी प्रजा भी बैठे हुए थे । सभी श्रेष्ठ लोगों ने अपने अपने मत सामने रखे कि राज्य से बढ़कर धरोहर कुछ नही है और इसको प्राप्त करने के लिए सिर कटवाने या फ़ूडवाने से बड़ा सौभाग्य भी कुछ नही है । बिना राजा के प्रजा किस प्रकार रह सकती है ? जिस प्रकार मधुमक्खीयों के छत्ते की एक रानी होती है ठीक उसी प्रकार भूमि का भी एक राजा होता है । तभी उनमें से एक बुद्धिजीवी ने कहा कि अल्मोड़ा में विजय चंद के पुत्र त्रिमल चंद रहते हैं । क्यों न उनको पत्र लिख कर इस राज्य की बागडोर वापस लेने का निमंत्रण भेजा जाय । इस पर सबकी सहमति बनी और उन्होंने कुँवर त्रिमल चंद को पत्र लिखा- हे उपमाओं के योग्य राजा त्रिमल चंद ! हम यहाँ पर कुशल नही हैं । हमारी तलहटी भाभर का रास्ता रोक दिया गया है । अब नमक और गुड़ जैसी जीवन उपयोगी सामग्री भी यहाँ तक नही पहुंच पा रही है । हम पर उपकार कर यह बन्द मार्ग खुलवा दीजिए और हमारे इस राज्य को अनाथ होने से बचा लीजिए राजन ।

संदेशवाहक पत्र लेकर अल्मोड़ा हाट पहुंचा । उसने त्रिमल चंद को एक राजा को जैसे सत्कार से नमन किया जाना चाहिए, नमन किया । उसके बाद उसने पत्र त्रिमल चंद को शौंप दिया । त्रिमल चंद ने पत्र खोलकर पढा और जैसे जैसे वह पढ़ता गया उसकी आँखे क्रोधवश लाल होती गयी । चेहरे के भावों से उसकी मूछें हिलने लगी और सहसा उसने कहा- "सूरज के होते हुए रात कैसे हो सकती है ।" आप वापस लौटिए सन्देशवाहक भाई और उन श्रेष्ठ बुद्धिजीवी लोगो से कहिए की मैं शिघ्र ही आऊंगा । त्रिमल चंद शिविर की तैयारी करने लगा । उसकी सभा में उपस्थित वृद्ध और श्रेष्ठ लोग उसके राज्याभिषेक का दिन सुनिश्चित करने लगे । लग्न की पोथी, सगुन इत्यादि का उचित प्रबंध देखकर शुभ महूर्त निकाला गया । पूरे चंपावत गढ़ में प्रसन्नता उमड़ पड़ी । नगाड़े बजने लगे । ब्राह्मण वेद पढ़ने लगे। चारों ओर चंद वँश की प्रशंसा में लोग यहां तक कहने लगे कि चंद हमारे राज्य की ज्योतिस्वरूप है । नारियां फाग गाने लगी- " आज धरा में प्रकाश हो गया, आज चंद रूपी चाँद का उदय हो गया।"

चंपावत गढ़ में राज्य की सम्पूर्ण प्रजा एकत्रित हो गयी । राजा के सम्मान में स्वर्ण तक के चढ़ावे आये । विशाल यज्ञ के लिए सम्पूर्ण गढ़ से घी एकत्रित किया गया । ब्राह्मणों के मंत्रोच्चारण के साथ साथ युवराज त्रिमल चंद का दूध व दही से राज्याभिषेक किया गया । राजा ने अभिषेक होने के बाद शपथ ली कि मैं राज्य के उत्तम चरित्र, कुशल वृद्धि, प्रजा प्रेम व पराक्रम द्वारा सुशासन स्थापित कर जनता की सेवा करूंगा । और उसके बाद त्रिमल चंद ने जनहित में एक एक कर सभी बाधाओं को हटा दिया और चंपावत गढ़ की जनता को राज्याभिषेक में दिया एक एक वचन पूरा कर दिया । राजा त्रिमल चंद की इन्ही कृतियों के कारण चंपावत में उनकी लोकगाथा गायी जाती है ।

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