रामी बौराणी लोकगाथा


धर्म-परायण की गाथाओं में सुमार रामी बौराणी की गाथा उत्तराखण्ड में विशिष्ट स्थान रखती है । पतिव्रता व एकनिष्ठ धर्म प्रधान रानी बौराणी की गाथा कई पीढ़ियों से उत्तराखंड में स्त्री समाज के लिए प्रेरणा स्त्रोत कहानियों में प्रसिद्ध है । रामी का पति विवाह के बाद उसको गाँव में छोड़कर परदेश चला जाता है । दिन, महीने और वर्षों व्यतीत हो जाते है लेकिन पति का कोई समाचार रामी को नही मिलता । रामी दिन रात अपने परदेश गये पति की याद में डूबती जाती जाती है और इस प्रकार नौ वर्ष का दीर्घकाल व्यतीत हो जाता है ।

नौ वर्षो के बाद जब एक दिन रामी अपने खेतों में कार्य करने हेतु गयी होती है तो उसका पति जोगी वेश में घर लौट आता है । रामी अपने घर के रास्ते वाले खेत पर धान की गुड़ाई कर रही होती है । तभी जोगी वेशधारी की नजर रामी पर पड़ती है और उसको संदेह हो जाता है की यह रामी ही है । अतः वह रामी से पूछता है - हे गुड़ाई करने वाली ! तुम्हारा नाम क्या है ? तुम्हारा गाँव कौनसा है ? और तुम किस भाग्यवान की प्रिय हो ? रामी जोगी को देखकर कुछ संकुचित हो जाती है, आखिर जोगी मुझसे ये सब क्यों पूछ रहा है ? रामी उत्तर देती है - हे जोगी तुम मुझसे ये सब क्यों पूछ रहे हो ? तुम्हें क्या चाहिए ? मैं रावतों की बहू हूँ और मेरा गाँव पाली है । अब जाओ अपने रास्ते । जोगी पूछता - पति ? रामी उत्तर देती है - मेरा निर्दयी पति वर्षों पहले मुझे यहां अकेली छोड़कर परदेश चला गया, मुझ अभागन को तो काल के घर में भी जगह नही है । अब जोगी का संदेह पूरा हो गया । यही मेरी रामी है । अपनी पत्नी की एकनिष्ठता की परीक्षा लेने के लिए जोगी रामी से आग्रह करता है - हे देवी ! धूप में तुम थक गयी हो, आओ छाँव में बैठकर हम अपने सुख-दुःख की बातें करते हैं । लगता है तुम बहुत दुःखियारी हो । यह सुनकर रामी कठोर शब्दों में उत्तर देती है - जोगी ! इस वेश में जाने पर भी लगता है तेरी आंखे नही खुली, छाँव में तेरे साथ तेरी बहिनें बैठेंगी । रामी का क्रोध देख जोगी समझ गया कि अब ज्यादा उलझना ठीक नही है । जोगी न कहां ठीक है तुम मुझे गाँव का रास्ता ही बता दो ? रामी ने उसको रास्ता बताया( जो उसको पूर्व से ही विदित था) और वह गांव में पहुंच गया । जैसे ही वह अपने घर के आँगन में पहुंचता है तो दरवाजा खुला देखकर आवाज देता है, कोई है ? अंदर से उसकी वृद्ध माँ बाहर आती है । लेकिन जोगी अपना भेद नही खोलता और वृद्ध माता से भोजन का आग्रह करता है । वह कहता है - माता बहुत जोरों की भूख लगी है कुछ खिला पिला दे तो तेरा मंगल ही मंगल होगा । वृद्ध माँ को जोगी पर दया आ जाती है और वह घर के आँगन से अपनी बहू रामी को आवाज लगती है- हे बहू ! घर आ देर हो गयी है खाना भी बनाना है । जब तक रामी घर आती है वृद्ध माँ अपने लापता पुत्र का सारा वृतांत जोगी को सुना देती है । जोग कहता है- माता अगर तूने मुझे भरपेट भोजन करवा दिया तो मैं तेरे लापता हुए बेटा का पता बता दूंगा । यह सुनकर वृद्ध माँ और अधिक उत्साहित हो जाती है और आदरपूर्वक जोगी को अंदर कमरे में आसन पर बिठा देती है । रामी खेत से घर पहुंचती है । हाथ मुँह धोकर वह जैसे ही कमरे में जाती है कि उसकी नजर जोगी पर पड़ जाती है और देखते ही बोल पड़ती है - ये जोगी तो पागल हो गया है । इसको शर्म भी नही आती । मैं इसके लिए कदापि भोजन नही बनाऊँगी । इसने मेरे पतिधर्म को गाली दी है । यह सुनकर जोगी क्रोधित होकर वृद्ध माँ से बोला- माई अपनी बहू को समझा । यह जोगी अगर बिना भोजन के लौट गया तो अनिष्ट हो जाएगा । जोगी खड़ा होकर लौटने को होता है कि वृद्धा ने कहाँ- हे जोगी महाराज ! नाराज मत हो, दुःखियारी है बेचारी । मैं उसको समझाती हूँ, आप बैठो । वृद्ध माता रसोई में बहू को समझाती है कि ये जोगी कोई चमत्कारी है बेटा, इसको भोजन करवा दे । इसने मुझसे कहा है कि ये तेरे लापता पति की जीवित या मरे की खबर देकर ही लौटेगा । तद्पश्चात रामी भोजन बनाती है । भोजन बनने के बाद रामी जोगी के लिए भोजन पत्तल में परोस देती है किन्तु जोगी ने भोजन करने से इनकार कर दिया और कहा मैं भोजन तभी ग्रहण करूँगा जब आपकी बहू भोजन उसी थाली में परोस के लाएगी जिसमें उसका पति भोजन किया करता था । यह सुनकर रामी ने जोगी को दुत्कार दिया- खाना है तो पत्तल में खाओ अन्यथा तुम जैसे कई जोगी कांधे पर थैला लटकाए हर रोज घूमते फिरते हैं फिर भी उन्हें भीख नसीब नही होती ।

अंत में जोगी भोजन कर ही लेता है । भोजन के पश्चात वृद्धा आंखों में आँसु लिए अपने पुत्र का पता पूछती है तो जोगी अपना भेद खोल देता है । वह अपनी नकली दाड़ी मूछ निकल देता है और कहता है - हे माँ ! मैं ही तेरा वो अभागा पुत्र हूँ जो नौ वर्ष तक तुझसे दूर रहा । यह सुनकर रामी को संदेह हुआ किन्तु जब उस जोगी ने एक एक कर सारी पुरानी यादें ताजा की तो रामी की आंखे भर आयी और माँ, बहू जी भर के रोए । इस प्रकार वृद्ध माँ को उसका पुत्र व रामी बौराणी को अपना पति मिलने पर अत्यंत खुशी प्राप्त हुई । यह गाथा उत्तराखंड के गढ़वाल मण्डल में प्रसिद्ध है । इसी से मिलती जुलती गाथा "रूपा" उत्तराखंड के कुमाऊँ में प्रसिद्ध है ।

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