"सरू" लोक गाथा


यह गाथा संदेह तथा आत्मग्लानि पर आधारित एक ऐसी कहानी है, जिसमें पति द्वारा संदेह करने पर सरू नामक स्त्री आत्महत्या कर लेती है ।


सरू के पिता उसका विवाह अन्यत्र (दूसरी जगह) करवाना चाहते थे किन्तु जाती से सजवाण युवक के प्रेम में डूबी हुई सरू अपने विवाह का किसी दूसरे व्यक्ति से कड़ा विरोध करती है । पुत्री की जिद्द के आगे पिता विवश हो जाता है और सरू के विवाह को सजवाण जाती के युवक के साथ स्वीकार कर लेता है । सरू के माता पिता सरू के इच्छा अनुसार उसका विवाह सजवाण युवक से कर देते हैं । इस विवाह से सरू व उसके पति बहुत खुश थे और दोनों खुशी पूर्वक अपना वैवाहिक जीवन व्यतीत करने लगे ।


कुछ समय बीत जाने के बाद सजवाण एक दिन किया कार्य को लेकर घर से बाहर गया होता है । उसकी अनुपस्थिति में सरू का जीजा उसके घर आ पहुंचता है । वह घर आये जीजा का आतिथ्य बढ़-चढ़ के करती है । घर आये मेहमान के साथ जैसा कुशल व्यवहार होना चाहिए , सरू ने भी वैसा ही व्यवहार अपने जीजा के साथ किया और राजी खुशी हासिल कर उसका जीजा वहां से लौट गया । सजवाण को जब इस आतिथ्य की जानकारी मिलती है तो उसके मन में सरू के प्रति संदेह पैदा हो जाता है । इस छोटी सी भ्रांति ने सजवाण को दुर्भावनाग्रस्त बना दिया और दिन बा दिन अपनी एकनिष्ठ पत्नी पर उसके जुल्म शुरू हो गये । यहाँ तक की वह कई बार उसको मारने पीटने भी लग गया । किन्तु सरू तो निर्दोष थी, उसने जो अपराध किया नही उसकी सजा वह कैसे सहन करती ? उसको आत्मग्लानि दिन पर दिन घेरती रही, कि आखिर जिस पुरुष के लिए मैंने अपने माता पिता की आज्ञा नही मानी वह मुझे इस तरह से प्रताड़ित कर रहा है । वह लाचारी में यह बात अपने माता पिता से भी नही कह सकी क्योंकि सजवाण से विवाह करना है, यह उसी की माँग थी । व्यथित होकर वह नदी में छलाँग लगाकर अपने जीवन का अंत कर देती है ।

कुछ समय बाद जब सजवाण को सच का ज्ञान होता है तो वह अत्यधिक व्याकुल हो उठता है और भ्रमित अवस्था में अपनी एकनिष्ठ पत्नी को यहां वहां ढूंढने लगता है । सजवाण कभी जंगल में घास लेने गयी घसेनियों (स्त्रियों) से अपने पत्नी के बारे में पूछता है तो कभी ऊंची ऊँची पहाड़ियों से उसको आवाज लगाता है - सरू...! सरू । कभी सघन बुराँस के पुष्प के बनो के बीच ढूंढता है तो कभी हिलांस (पक्षी) के कूकने पर सोचता है कि यह मेरी सरू की आवाज है । क्योंकि अभी तक उसको अपनी पत्नी की लास नही मिली और न उसको यह पता लगा कि वह कहां गयी । तभी खबर मिलती है की सरू ने नदी में छलांग लगा के अपनी जान दे दी । सजवाण रोते हुए सोचने लगा कि यदि मैं यह जानता कि सरू डूबने जा रही है तो मैं उसकी चोटी पकड़ लेता । सरू ! तेरे बिना बसंत के आगमन पर यह बुराँस के फूल मेरे लिए व्यर्थ हैं । अब इन्हें देखकर मेरे हृदय को और भी दुःख होता है । सरू...! क्या तू कभी सपने में भी नही दिखाई देगी क्या ? हाय ! रे शंका, तूने न मालूम कितने दम्पतियों के सुखी जीवन को वीरान कर दिया ।

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