गोरीधना (भ्रातृ प्रेम)लोककथा


गढ़वाल भाग में जिस प्रकार सदेई की गाथा प्रसिद्ध है, उसी प्रकार कुमाऊँ में गोरीधना गाथा भाई - बहन के प्रेम की अमर प्रेम गाथा है । जिसमें दोनों का कारुणिक अंत हो जाता है ।


इस कहानी की मुख्य पात्र गोरीधना नाम की लड़की है जिसका विवाह नागवंशीय परिवार में होता है । बसंत ऋतु में वृक्षों की डाल फूलों से भर जाती हैं । पुष्पों पर भौंरे मंडराने लगते हैं । सघन-गहन घाटियों में न्योली और हिलांस (पक्षी) आवाज देने लगते हैं । आँगन में घुघुती भी घूर -२ घूरने लगती है । यह सब देख कर ससुराल में गोरीधना का मन उदास हो जाता है । वह अपने मन में सोचने लगती है- हे ! हिलांस(पक्षी), तू मेरे मायके में जाकर बोल और तेरी आवाज सुनकर मेरे पिता जी मेरे भाई को मुझसे भेंटने (मिलने के लिए) भेजेंगे । मेरी देवरानी और जेठानी के मायके से उनके भाई तो भेटोली लेकर आ गये । लेकिन मुझे भेटोली देने कौन आएगा ? बड़ा भाई तो राजा की सेवा में है और मेरे पीठ का भाई अभी इतना बड़ा नही कि वह अकेला यहां आ सके ।

इसी प्रकार दिन, महीने और वर्ष व्यतीत हो गये । लेकिन उसके मायके से कोई नही आया । जब गोरीधना का छोटा भाई बासलदेव बारह वर्ष का हो जाता है । तो एक दिन वह गाँव के ग्वालों के साथ यमुना के किनारे गाय चराने आता है । ग्वाले उसको बहुत उलाहना देते हैं कि तू तो बहन हीन है । अतैव अपनी गायों को हमारी गायों के साथ मत मिला और इस बात को लेकर उसका ग्वालों से झगड़ा हो जाता है । बासलदेव रोता हुआ अपनी माँ के पास पहुंचता है और माँ से कहता है- हे माँ ! क्या सच में मेरी कोई बहन नही है ? और यदि है तो उसका पता बता । माँ जवाब देती है - बेटा तेरी बहन गोरीधना है और वह चार नदियों के पार कालीनाग को ब्याही गयी है । बासलदेव कहता है- माँ मैं इस चैत्र माह में अपनी बहन से भेंट करने जाऊंगा । तू एक टोकरा भर पूरियां बना दे, उसके लिए वस्त्र सिलवा दे और टिका लगाने का रुपया भी दे । जिसे लेकर मैं अपनी बहन के पास जाऊंगा ।

चैत्र माह में बासलदेव छाबड़ी (टोकरी) बांधकर बहन को भेंटने के लिए निकल पड़ता है । ऊंचे पर्वत शिखरों और गहरी नदी घाटियों को पार करता हुआ वह अपनी बहन के ससुराल में प्रवेश करता है । गोरीधना की ननद गोरीधना को समाचार देती है कि उसका अनुज उससे भेंट करने आया है तथा वह गांव के चौराहे पर स्थित पीपल के वृक्ष के नीचे बैठा हुआ है । गोरीधना यह सुनकर गध गध हो उठती है और अपने भाई से भेंटने आधे रास्ते तक पहुंच जाती है । बहन ने अपने भाई को देखते ही बाहों में जकड़ लिया और मिलन के अश्रु आंखों से टप टप बहने लगे । और फिर मायके का कुशल हाल जाना ।

इसी बीच गोरीधना का पति कालीनाग आ पहुंचाता है । वहांं गैर आदमी की मौजूदगी से नाग क्रोधित हो उठता है और पूछता है ये मनुष्य कि गंध कहां से आ रही है ? गोरीधना ने जवाब दिया- यमुना की सौगंध ! मेरा छोटा भाई आया है । तभी बासलदेव उसके समक्ष आकर कहता है मैं चैत्र माह में बहन को बुलाने आया हूँ । लेकिन कालीनाग (जो इच्छा से नाग बन जाता था) को अपनी पत्नी गोरीधना पर संदेह हो जाता है और वह बासलदेव को डँस देता है । धीरे धीरे जहर जैसे जैसे शरीर में प्रवेश करता है उससे पूर्व ही बासलदेव क्रोधित होकर कालीनाग को जमीन में ही रौंध कर मार डालता है । और शरीर में जहर फैलने के कारण बासलदेव की भी मृत्यु हो जाती है । यह सब देखकर गोरीधना ने अपने जीवन का वहीं पर अंत कर दिया ।

गेहूं की फसल पकने लगी थी, सीढ़ी नुमा खेतो की मेंढ़ों पर फ्योंली के फूल खिले हुए थे । लोग भाई-बहन के शवों को लेकर पंच तत्व में लीन करने को ले जा रहे हैं । अब भाई बहन का यह अधूरा मिलन कैसे पूर्ण होगा ? भ्रातृ स्नेह की चारुचन्द्रिका पर वहम के राहू की हत्यारी छाया ने अनर्थ का सीमा उलंघन कर दिया ।

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