यह गाथा 'मलेथा कूल' की तरह ही नरबलि दिए जाने पर आधारित है । जिस प्रकार प्रसिद्ध भड़ माधोसिंह भंडारी ने अपने पुत्र गजेसिंह की बलि मलेथा कूल के लिए दी, इसी प्रकार बड़ियारी सेरा की कूल निकालने में व्यवधान के निवारण हेतु एक अनाम बहू की बलि दिए जाने का व्याख्यान लोकगाथा के रूप में प्रचलित है । जीरी शब्द धान के लिए प्रयुक्त किया जाता है ।


बडियार के सेरा (उपजाऊ भूमि) में सिंचाई के लिए कूल (पानी की नहर) का पानी नही पहुंच पा रहा था । गृहस्वामिनी अपने पति से कहती है कि सभी के सेरो में धान लग गया है । हमारे खेत पर किसका दोष लग गया है, जो वहां तक कूल (नहर) का पानी नही पहुंच रहा है । इसको लेकर ज्योतिष के पास गणत करवाया गया । तो ज्योतिष ने बताया की नर बलि के बाद ही सेरे तक कूल का पानी आयेगा । इसके बाद घर में इस पर विचार-विमर्श किया गया कि किसकी बलि दी जाए ? पिता की बलि पर खामोश हो गये और माँ की बलि दी जाती है तो चूल्हा सूना पड़ जाएगा । भाई व बहिन की बलि देने पर भी कोई सहमति नही बन पाई । अंत में बलि देने के लिए छोटे भाई की पत्नी का चुनाव किया गया । छोटे भाई की पत्नी को कहा गया कि मायके जाकर अपने माता पिता से भेंट कर आओ तथा भाई बहनों को राजी खुशी भी ले आना । लेकिन बहू को पूर्वाभास हो जाता है । भरे-पूरे यौवन में इस सुमोहक संसार से चिर विदाई की व्यथा । बेचारी बहू का अंतर्मन रो उठता है किन्तु ससुराल को समर्पित वह, अपनी निर्मम बलि का भेद नही खोलती है ।



जब वह अपने पिता के घर से लौट रही होती है तो अपने पिता से कहती है की मुझे अंतिम बार के वस्त्र सिलवाकर दे दो । मां से अंतिम बार की खीर व भाई से अंतिम बार के कलेऊ बनाने को कहती है । अपनी भाभी को कहती है कि भाभी तुम भी मेरा अंतिम सृंगार कर दो फिर तुम्हें दुःख नही दूँगी । उसकी इन बातों को सुनकर माँ कहती है कि ससुराल जाते समय ऐसी अपशकुनपूर्ण बाते मत कर बेटी ।


मायके से प्रस्थान कर तब छोटी बहू बलि का बकरा बन ससुराल पहुंचती है तथा दूसरे ही दिन उसकी आहुति की खबर सास से प्राप्त हुई । इस प्रकार पारिवारिक हित व समृद्धि के लिए परिवार की छोटी बहू आत्म बलिदान कर देती है । फलस्वरूप बडियार के सेरे में धान की खेती लहलहाने लगती है ।

नि:संदेह सृष्टि में सृजन की जितनी पीड़ा नारी ने भोगी है, उतनी नर ने नही भोगी । वह सृजन चाहे संतति सम्बंधी हो या समुन्नति सम्बंधी । और वही इस प्रकृति की सच्ची पुत्री है , जिसने मात्र त्याग सीखा है । इन कहानी की पात्र छोटी बहू भी उसी आदर्श का उदाहरण है जिसको अपनी मृत्यु का आभास हो चुका था, जिसके पास वहां से दूर भाग जाने का मौका भी था । लेकिन उसको अपने त्याग में अपने परिवार की उन्नति दिखी और वह जानकर भी चुप रही और सेरे में पानी पहुंच सके इसलिए चुपचाप बलिदान हो गयी । कैसी शक्ति रही होगी कि एक निर्दोष के प्राणों पर भी धरती नही डोली । एक पुत्री घर जाकर भी अपनी माँ से भी कुछ नही बोली और चली आयी बलिदान होने ससुराल में ।