देवकी एक लोकगाथा


वीर नारी देवकी की गाथा उसके सतीत्व की अमर कहानी है । इस करुण व रोचक कहानी का आरम्भ फ्रांस व जर्मनी के युद्ध से होता है । देवकी अपने पति की प्रतीक्षा में किस प्रकार अपनी वीरता से अपनी पवित्रता और अखण्डता को बनाये रखती है, पर आधारित यह लोकगाथा है ।


जर्मनी और फ्रांस का भीषण युद्ध चल रहा है । इन्ही दिनों उत्तराखंड के राठ क्षेत्र गोठ गांव का युवक अमरसिंह भारतीय सेना में भर्ती होता है । कुछ ही समय में वह अपनी मातृ भूमि से दूर ब्रिटिश वाहिनी के एक सैनिक के रूप में फ्रांस भेज दिया जाता है । सेना में भर्ती होने से पूर्व उसका विवाह देवकी नाम की एक कन्या से हो जाता है, जो अब उसकी नव-विवाहिता के रूप में उसी गाँव गोठ में रह जाती है । दीर्घकाल तक फ्रांस के रणक्षेत्र से अमरसिंह की कोई असल-कुशल नही पहुँचती । चिंता-भयाक्रांत देवकी ईश्वर से उसके स्वस्थ होने का स्मरण करती रहती और नित्य दान-पुण्य के कार्यों में विरह-बोझिल जीवन यापन करती रही । चैत्रमाह में समस्त पर्वतों की चोटियां हरितावर्ण से आच्छादित हो जाती हैं, विभिन्न रगों के पुष्प खिल उठते हैं, घुघुती पक्षी के मधुर स्वरों से देवकी का प्राण व्याकुल हो उठता है । देवकी अपने समस्त कुल के देवी-देवताओं का स्मरण कर युद्ध से अपने पति के सकुशल लौटने की विनती करती है । किन्तु भाग्य का लिखा कौन मिटा  सकता है ? जिस अनहोनी से आशंकित देवकी दिन रात ईश्वर से प्रार्थना करती रही, अंत में वही अशुभ समाचार फ्रांस के रणक्षेत्र से प्राप्त हुआ । फ्रांस और जर्मनी के रणयुद्ध में अमरसिंह वीरगति को प्राप्त हो गया, ऐसा अशुभ समाचार देवकी को प्राप्त हुआ । देवकी इस भयानक बज्राघात को अपनी किश्मत का लेखाजोखा मानकर एक सैनिक की विधवा के रूप में धैर्यपूर्वक सरल-सतीत्व जीवन यापन करने लगती है ।

एक दिन जब गांव की कुछ बहू बेटियां घास लेकर थकी-हारी घर लौट रही थी, तो कुछ जल लेने जलधारा पर गयी हुई थी और कुछ संध्याकालीन भोजन की तैयारी में लीन थी । तभी हींग बेचने वाला एक "काबुली" गांव में पहुंचता है । लम्बा व भारी शरीर वाला पठान, लम्बा चोला पहने हुए था । भूरी आँखे तथा मैले-कुचैले वस्त्रोंवाला वह, साक्षात पिशाच दृष्टिगोचर होता था । उसकी इस भेश भूषा से आशंकित कोई भी ग्रामीण उसको रात्रि विश्राम हेतु आश्रय देने को तैयार नही था । तभी उस "काबुली" को गांव से कुछ दूरी पर एक मकान दिखाई देता है । वह मकान उस अभागिनी देवकी का ही था जहां वह एकांतवास कर रही थी । वह वीरगति को प्राप्त स्वामी के नाम का व्रत धारण कर दीन-दुःखियों और भूखे प्यासों की सेवा को अपना सौभाग्य मानती थी । गांव से दुत्कारे जाने पर वह "काबुली" देवकी के आँगन में जाकर कहता है- बहिन ! मैं परदेशी हूँ । मुझे आज रात्रि के लिए आश्रय चाहिए और सुबह होते ही मैं वापस लौट जाऊंगा । देवकी मन से बहुत सहज स्वभाव की थी अतैव यह सुनकर उनके मन में दया का भाव आ गया तो उसने निचली मंजिल के एक कमरे में उसको आश्रय दे दिया । अतिथि का आदर वह अपना सौभाग्य समझती थी इसलिए उसने "काबुली" को भरपेट भोजन भी प्रदान किया ।

सुनसान अंधेरी रात्रि में जब यहां वहां केवल कुत्तों के भौंकने की आवजे सुनाई दे रही थी, कृतघ्न कामुक काबुली अपने कमरे से बाहर निकलकर मकान की ऊपरी मंजिल की दहलीज पर पहुंचता है तथा देवकी के दरवाजे को धक्का देकर कहने लगा- "अपना भला चाहती हो तो दरवाजा खोलो अन्यथा मैं तुम्हे हमेशा के लिए सुला दूँगा" । नींद में काबुली की डरावनी आवाज देवकी के कानो में पड़ती है । वह चौंककर नींद से उठती है । अपने आप को बन्द कमरे में असहाय समझकर वह व्याकुल हो उठी, उसके बचने का कोई उपाय नही था । उसने बहुत प्रयास किया कि दरवाजा न खुल सके लेकिन पिशाच जैसे शरीर वाले काबुली की एक लात से दरवाजा टूट गया । जैसे ही दरवाजा टूटा देवकी ने देखा कि लाल आंखे किये हुए, हाथ में छुरा लिए, सामने काल सा काबुली खड़ा है । देवकी ने रोषपूर्ण आवाज में कहा- अरे ! दुरात्मा तू अभी मेरे घर से निकल जा । सोई हुई सिहिंनी को जगाकर तू अपने प्राण क्यों गवाना चाहता है ? अग्नि में हाथ डालकर तू सुरक्षित नही रह सकता । किन्तु काबुली देवकी को बेसहारा अबला समझकर उसके सतीत्व हरण को लपट गया ।


फिर क्या था ? देवकी के बिस्तर के समीप रखी बिजली के सदृश्य चमकती हुई कटार ने काबुली का सर धड़ से अलग कर दिया । देवकी की वीरता ने पतिव्रत की अखण्डता को अक्षुण्ण रखकर उत्तराखंड की नारी शक्ति को युगों युगों के लिए एक अनमोल मोती के रूप में स्थापित कर दिया ।

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