तीलू रौतेली लोकगाथा



उत्तराखंड की रानी लक्ष्मीबाई "तीलू रौतेली" चौंदकोट के थोकदार भूपसिंह की पुत्री तथा भगतु और पत्वा नाम के दो बहादुर जुड़वा भाइयों की बहन थी । पन्द्रह वर्ष की अवस्था में तीलू की सगाई कर दी गयी । किन्तु विवाह से पूर्व ही युद्ध में उसके भावी पति की मृत्यु हो गयी ।


उन्ही दिनों कत्यूरी राजा धामशाही ने गढ़वाल के तात्कालिक राजा मानशाही की राजधानी खैरागढ़ पर आक्रमण कर दिया । वीरता पूर्वक सामना करने पर भी जब मानशाही परास्त होने लगा तो उसने अपनी राजधानी छोड़ दी और भाग कर चाँदपुरगढ़ी (वर्तमान चमोली में) अपना डेरा डाला । तीलू के पिता भूपसिंह ने कत्यूरियों के खिलाफ मोर्चा सम्भाला किन्तु वह भी जल्दी ही वीरगति को प्राप्त हो गये । उनके दोनों पुत्र भगतु और पत्वा भी युद्ध में मारे गये । युद्ध शान्ति के बाद शीतकाल के बाद जब कांडा का प्रसिद्ध मेला आया तो तीलू ने अपनी माँ से वहां जाने की इच्छा जताई । तीलू के इस कथन से माँ को अपने पुत्रों और पति की स्मृति हो आयी । उसने कहा- आज अगर मेरे दो पुत्र जिंदा होते तो अवश्य कत्यूरियों से अपने पिता की मृत्यु का बदला लेते । और कत्यूरियों के रक्त से कांडा की भूमि का तर्पण करके मेले में जाते ।

तीलू रौतेली माँ की बात सुनकर मन से व्यथित हो उठी, उसके रक्त में मानो उभाल सा चढ़ गया और उसने कहा- माँ तुम्हारे पुत्र नही हैं, पर पुत्री तो है । मैं अवश्य ही अपने पिता और भाइयों की मृत्यु का बदला लूंगी । और जैसा तुम्हारा कथन है उसी प्रकार कत्यूरियों के लहू से इस भूमि को सिंचित कर दूँगी । उसने सारे क्षेत्र में घोषणा करवा दी कि इस वर्ष हमारे यहां कोई मेला नही मनाया जाएगा । इस वर्ष कत्यूरियों के सर्वनाश का उत्सव होगा, जाकर युद्ध के लिए वीर योधावों को तैयार करो । तीलू ने तत्क्षण अपने साधारण वर्ष त्याग कर दिए और वीरांगनाओं वाली पोशाक धारण कर ली । अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित तीलू के साथ उसके आवाहन पर अनेक बहादुर युवक तैयार हो गये । जैसे ही तीलू काले रंग के घोड़े पर सवार हुई तो साथ उसकी दो सहेलियां बेल्लू और रक्की भी उसके साथ चलने को उसके समक्ष प्रस्तुत हो गयी । तीलू ने परम् श्रद्धापूर्वक सबसे पहले अपने कुल देवी देवताओं की मनौती (स्तुति) की "यदि मैं रणक्षेत्र में विजयी होकर लौटी तो सोने का छत्र चढ़ाऊंगी ।" और अपने माता के चरणों को छूंकर कहा माँ मुझे मेरे विजय होने का आशीर्वाद दो, जिससे मैं आपके पति व पुत्रों की मृत्यु का बदला पूरा कर सकूं । और तीलू रौतेली ने अपने दल के साथ रण-क्षेत्र के लिए प्रस्थान किया । तीलू के नेतृत्व में उसके दल ने सर्वप्रथम अपना अभियान खैरागढ़ (वर्तमान कालागढ़ के समीप) से प्रारम्भ किया । उस स्थान पर कत्यूरियों ने अपना अधिकार जमा रखा था । जैसे ही तीलू ने इस गढ़ को चारों ओर से घेरा तो कत्यूरियों और तीलू के बीच घमासान युद्ध हुआ, कत्यूरी परास्त हो गये । तीलू ने खैरागढ़ में अपनी चौकी स्थापित की । तभी खबर आयी कि शत्रु सैनिक अन्य मार्ग से तकोलीखाल पहुंच गये हैं । तत्क्षण विरबाला तीलू अपने दल के साथ वहां पहुंची और कत्यूरी सेना को वहीं ढेर कर दिया । उसके बाद तीलू रौतेली ने भौन, सल्ठ महादेव, भीलण भौन, चौखुटिया, सराइखेत और कालिकाखाल को शत्रुओं से मुक्त करवाया तथा कुछ दिन वीरोंखाल में विश्राम किया ।

अपनी सीमा से शत्रु दल को पीछे खदेड़ने के बाद तीलू जब अपने दल के साथ कांडा (काण्डागढ़) की ओर प्रस्थान कर रही थी तो समीप ही नयार नदी के किनारे उसने अपने दल को रोक दिया । जब सभी थके सैनिक विश्राम कर रहे थे तो तीलू अकेले ही नयार नदी में नहाने निकल गयी । दुर्भाग्य से निकट ही झाड़ी में छिपे कत्यूरी सैनिक रामू रजवार ने उस पर प्रहार कर दिया । पन्द्रह वर्ष की अंतिम चरम में तीलू ने अपनी रण-यात्रा शुरू की थी और सात वर्ष के अनवरत संग्राम के बाद कुशलता पूर्वक युद्ध जीतकर घर लौट रही तीलू मात्र बाईस वर्ष की आयु में वीरगति को प्राप्त हो गयी । तीलू रौतेली ने माँ को दिया वचन तो पूरा किया, उसने लगातार सात साल कत्यूरियों से गढ़वाल की धरती को तर्पण दिए किन्तु कुल देवी की मनौती को वीरांगना पूरी न कर सकी । तीलू रौतेली की वीरता की गाथाएँ आज सम्पूर्ण उत्तराखंड में जागर स्वरूप प्रसिद्ध हैं जिसमे वीरांगना के सम्पूर्ण युद्ध के वृतांत से लेकर अंतिम पक्तियों में कुल देवी के लिए सम्बोधन तक, कि माँ खाटली कालिका, तडासर, सिघिणी, शार्दूला जब तक इस धरती पर सूरज, चाँद और तारे रहेंगे यह वीरांगना तीलू रौतेली के वीरता के शाक्षी रहेंगे । इस प्रकार मात्र 16 वर्ष की आयु से 22 वर्ष की आयु तक क्षत्रिय वीरता का परिचय देने वाली इस वीरांगना को उत्तराखण्ड के इतिहास में लक्ष्मीबाई की उपाधि से सम्बोधित किया गया ।

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